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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 46 of 1416

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( १४ ) भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-

और कफज्वरके पूर्वरूपमें मृदु वमनकारक औषध सेवन करानी चाहिये एवं द्वन्द्वज (अर्थात वात-पित्तजज्वर, पित्त-कफजज्वर और वात-कफज) ज्वरोंके पूर्वरूपमें दोनों दोषोंकी मिश्रित और सन्निपातज्वरमें त्रिदोषनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ७२ ॥ ७३ ॥

नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् ।
क्रोधप्रवातव्यायामकषायाँश्च विवर्जयेत् ॥ ७४ ॥

नवीन ज्वरमें दिनमें सोना, स्नान, तैल आदिका मलना, अन्नका आहार, स्त्रीप्रसंग, क्रोध, प्रवल व पूर्वकी तीव्र वायुका सेवन, परिश्रम और काथ इनको त्यागदेना चाहिये ॥ ७४ ॥

कषायं यः प्रयुञ्जीत नराणां तरुणज्वरे ।
स सुप्तं कृष्णसर्पं तु कराग्रेण परामृशेत् ॥ ७५ ॥
न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणज्वरे ।
कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः ॥ ७६ ॥
चतुर्भागावशिष्टस्तु यः षोडशगुणाम्भसा ।
स कषायः कषायः स्यात्स वर्ज्यस्तरुणज्वरे ॥ ७७ ॥

जो वैद्य नवीन ज्वरमें काथ (काढ़े) को प्रयोग करता है, वह सोतेहुए काले साँपको हाथसे छूकर जगाता है। इसलिये नवीन ज्वरमें कषाय (काथ) कभी नहीं प्रयोग करना चाहिये। कारण, काथके प्रयोगसे दोष आकुलित होकर इतने प्रबल हो जाते हैं कि, उनको जीतना अत्यन्त कठिन हो जाता है। काथकी एक छटाँक औषधियोंको एक सेर जलमें पकाकर चौथाई भाग जल शेष रहनेपर नीचे उतारकर छानलेवे। इसको कषाय(काथ-पाचन) कहते हैं। यह नवीन ज्वरमें वर्जित है ॥ ७५-७७ ॥

न द्विरद्यान्न पूर्वाह्ने नाभिष्यन्दि कदाचन ।
न नक्तं न गुरुप्रायं भुञ्जीत तरुणज्वरी ॥ ७८ ॥
परिषेकान् प्रदेहाँश्च स्नानं संशोधनानि च ।
दिवास्वप्नं व्यवायं च व्यायामं शिशिरं जलम् ॥ ७९ ॥