Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 430 of 1416

Read in context
Page 430
३९८भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

जवाखार, सज्जी, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सेंधानमक, विरियासंचर नमक, सोंठ, पीपल, मिरच, और शुद्धमीठा तेलिया यह प्रत्येक १-१ तोला एवं इमलीका क्षार ४तोले और शंखभस्म ४ तोले सबको एकत्र मिलाकर नीम्बूके रसमें खरल करे । फिर उसमें लोहभस्म, घीमें भुनी हुई हींग और वंगभस्म प्रत्येक एक एक तोला मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरलकर १-१ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह शंखवटी जठराग्निकी अत्यन्त वृद्धि करनेवाली, शूलको नष्ट करनेवाली, पाचन शक्तिको बढ़ानेवाली एवं श्वास, खाँसी, क्षय, मन्दाग्नि, वातरोग, उदरके भयंकर रोग, तृषा कृमि रोग, दुष्टव्याधि तथा अन्यान्य सर्वप्रकारके रोगोंको नष्ट करनेवाली है ॥ १३० ॥ १३१ ॥

चतुर्थ-शंखवटी और महाशंखवटी ।

दग्धशङ्खस्य चूर्णं स्यात्तथा लवणपञ्चकम् ।
तिन्तिडीक्षारकं चैव कटुकत्रयमेव च ॥ ३२ ॥
तथैव हिङ्गुकं ग्राह्यं विषं पारदगन्धकम् ।
अपामार्गस्य वन्हेश्च क्वाथैर्लिम्पाकजै रसैः ॥ ३३ ॥
भावयेत् सर्वचूर्णं तदम्लवर्गैर्विशेषतः ।
यावत्तदम्लतां याति गुटिकाऽमृतरूपिणी ॥ ३४ ॥
सद्यो वह्निकरी चैव भस्मकं च नियच्छति ।
भुक्त्वाऽऽकण्ठं तु तस्यान्ते खादेच्च गुटिकामिमाम् ॥
तत्क्षणाज्जरयत्याशु पुनर्भेजनमिच्छति ॥ ३५ ॥

शंखभस्म, पाँचोंनमक, इमलीका क्षार, त्रिकटु, हींग, शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर चिरचिटेके क्वाथ, चीतेकी जडके क्वाथ और नींबूके रसमें तथा विशेषकर अम्लवर्गके रसमें (जबतक खट्टापन उत्पन्न न हो तबतक) खरल करे फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह अमृतरूपी वटी तत्काल अग्निको दीपन करती है और भस्मक रोगको दूर करती है । कण्ठपर्यन्त भोजन करनेपर भी इस गोलीको खावे तो यह वटी तत्क्षण सम्पूर्ण अन्नको पचा देती है और सर्वप्रकारके अजीर्णको नष्ट करती है ॥ ३२-३५ ॥

ज्वरं गुल्मं पाण्डुरोगं कुष्ठं शूलं प्रमेहकम् ॥ ३६ ॥
वातरक्तं महाशोथं वातपित्तकफानपि ।
दुर्नामारियं चाशु दृष्टो वारसहस्रशः ॥ ३७ ॥