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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 423 of 1416

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Page 423

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३९१


ताँबेकी भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, साँठ, पीपल, मिरच, तीक्ष्णलोह और कालानमक इन सबको समानभाग लेकर खरलमें १ दिनतक घोटकर वालुकायंत्रमें रख १ प्रहरतक पकावे । जब पककर स्वयं शीतल हो तब उसमें लाल विषखपरेका क्षार सब औषधिके समान मिलाकर बिजौरेनीम्बूके रसमें खरल करलेवे तो यह राक्षसनामसे प्रसिद्ध रस सिद्ध होताहै । यह रस मन्दाग्निको नष्ट करताहै ॥८९॥

पञ्चामृतवटी ।

अभ्रकं पारदं ताम्रं गन्धकं मरिचानि च ।
समभागमिदं चूर्णं चाङ्गेरीरसमर्दितम् ॥ ९० ॥
मर्दिते हि रसे भूयो जयन्तीसिन्धुवारयोः ।
भावनापि च दातव्या गुञ्जापरिमिता वटी ॥ ९१ ॥
तप्तोदकानुपानेन चतस्रस्तिस्र एव वा ।
वह्निमान्द्ये प्रदातव्या वट्यः पञ्चामृतास्तथा ॥ ९२ ॥

अभ्रककी भस्म, शुद्ध पारा, ताँबेकी भस्म, शुद्ध गन्धक और मिरच इन प्रत्येकके चूर्णको समान भाग लेकर नोनियाके रसमें खरल करके अरणी और सिंहालुके रसमें खरल करे । फिर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर इनमेंसे ३ वा ४ गोली गरम जलके साथ सेवन करावे तो यह पञ्चामृतनामवाली वटी मन्दाग्निरोगमें पञ्चामृतकी समान गुण करती है ॥ ९०-९१ ॥

जवालानलरस ।

क्षारद्वयं सुतगन्धौ पञ्चकोलमिदं समम् ।
सर्वतुल्या जया देया तदर्द्धं शिग्रुवल्कलम् ॥ ९३ ॥
एतत् सर्वं जया शिग्रु वह्निमार्कवजै रसैः ।
भावयेत्त्रिदिनं घर्मे ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ९४ ॥
भावयेत्सप्तधा चार्द्रद्रवैर्ज्वालानलो भवेत् ।
पाचनो दीपनो हृद्यश्चोदरामयनाशनः ॥ ९५ ॥

जवाखार, सज्जी, पारा, गन्धक और पंचकोलकी औषधियाँ ये सब समान भाग समस्त औषधियोंकी बराबर भाँग और भाँगसे आधी सहिंजनेकी जड़की छाल इन सबका एकत्र चूर्ण करके भाँग, सहिंजना, चीता और भाँगरा प्रत्येकके रसमें वा क्वाथमें पृथक् २ तीन दिनतक धूपमें खरल करके लघुपुटमें पकावे । फिर अदरखके रसमें