Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 420 of 1416

Read in context
Page 420

३८८ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-

खरल करे तो भास्करनामक रस सिद्ध होता है । इसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली पानमें रखकर भक्षण करे तो यह रस जठराग्निको तत्काल दीपन करता है एवं सर्वप्रकारके शूल, विषूचिका और अग्निमान्द्यादि विकारोंमें हितकर है । ऐसा चन्द्रनाथने कहा है ॥ ७०-७३ ॥

अग्निसन्दीपन रस ।
षडूषणं पञ्चपटु त्रिक्षारं जीरकद्वयम् ।
ब्रह्मदर्भोग्रगन्धे च मधुरी हिङ्गु चित्रकम् ॥ ७४ ॥
जातीफलं तथा कुष्ठं जातीकोषं त्रिजातकम् ।
चिञ्चाशेखारिकक्षारममृतं रसगन्धकौ ॥ ७५ ॥
लौहमभ्रं च वङ्गं च लवङ्गं च हरीतकी ।
समभागानि सर्वाणि भागौ द्वावम्लवेतसात् ॥ ७६ ॥
शङ्खस्य भागाश्चत्वारः सर्वमेकत्र भावयेत् ।
क्वाथेन पञ्चकोलस्य चित्रापामार्गयोस्तथा ॥ ७७ ॥
अम्ललोणीरसेनैव प्रत्येकं भावयेद् द्विधा ।
त्रिः सप्तकृत्वो निम्पाकरसैः पश्चाद् विभावयेत् ॥ ७८ ॥
बदराभा वटी कार्या भोक्तव्या सन्ध्ययोर्द्वयोः ।
अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्वा दोषानुसारतः ॥ ७९ ॥
अग्निसन्दीपनो नाम रसोऽयं भुवि दुर्लभः ।
दीपयत्याशु मन्दाग्निमजीर्णं च विनाशयेत् ॥
अम्लपित्तं तथा शूलं गुल्ममाशु व्यपोहति ॥ ८० ॥

पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड, सोंठ, मिरच, पाँचों नमक, जवाखार सज्जी, सुहागा, जीरा, कालाजीरा, अजवायन, वच, सौंफ, हींग, चीतेकी, जड, जायफल, कूठ, जावित्री, दालचीनी, तेजपात, इलायची, इमलीकी छालकी भस्म, चिरचिटेकी भस्म, शुद्ध मीठा तेलिया, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहा, अभ्रक, वङ्ग, लौंग, और हरड इन सबको समान भाग अर्थात् प्रत्येक १-१ तोला, एवं अम्लवेत २ तोले और शंखभस्म ४ तोले लेवे । सबको एकत्र चूर्ण करके पञ्चकोलके क्वाथ, चीतेकी जडके क्वाथ, चिरचिटेके क्वाथ और नोनियाके रसमें पृथक् पृथक् दो दो बार भावना देवे । फिर जम्भीरी