भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३८१
इस चूर्णको मट्ठा, दहीका तोड, मदिरा, सिर्का, शुक्तनामक काँजी, जंगली जीवोंका मांभरस इन अनुपानाँके साथ अथवा अन्यान्य विविध प्रकारके रसोंके साथ प्रतिदिन सेवन करनेसे मन्दहुई अग्नि तत्कालही अत्यन्त दीपन होती है, एवं वात-कफजन्य रोग, वातगुल्म और सर्वप्रकारके वातशूल नष्ट होते हैं । यह चूर्ण बवासीर, संग्रहणी, कुष्ठ, भगन्दर, हृदयरोग, आमदोष, अनेक प्रकारके उदरविकार, प्लीहा, पथरी, श्वास, खाँसी, उदरके कृमि, विशेषकर शर्करासम्बन्धी रोग, पाण्डुरोग, तथा अन्यान्य विविध प्रकारके रोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है, जैसे—वज्र वृक्षोंको तत्काल विनाश करदेता है ॥ ३१-३५ ॥
श्रीरामबाणरस ।
पारदामृतलवङ्गगन्धकं भागयुग्ममरिचेन मिश्रितम् ।
जातिकाफलमथार्द्धभागिकं तिन्तिडीफलरसेन मर्दितम् ॥ ३६ ॥
माषमात्रमनुपानयोगतः सद्य एव जठराग्निदीपनः ।
संग्रहग्रहणि कुम्भकर्णकं सामवातखरदूषणं जयेत् ॥
वह्निमान्द्यदशवक्त्रनाशनो रामबाण इव विश्रुतो रसः ॥ ३७ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध मीठा तेलिया, लौंग और शुद्ध गन्धक प्रत्येक एक एक तोला, मिरच दो तोले एवं जायफल ६ मासे इन सबको एकत्र पीसकर कच्ची इमलीके रसमें खरल करके उर्दकी बराबर गोलियाँ बनालेवे तो यह रामबाण रस सिद्ध होता है । इस रसके सेवनसे जठराग्नि शीघ्रही अत्यन्त दीपन होती है । एवं प्रबल संग्रहणीरूपी कुम्भकर्ण, आमवातरूप खर-दूषण और मन्दाग्निरूपी रावणको रामबाणकी समान नष्ट कर देता है । ऐसा सुनागया है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
अग्नितुण्डीरस ।
शुद्धसूतं विषं गन्धमजमोदा फलत्रयम् ।
सर्जिक्षारं यवक्षारं वह्निसैन्धवजीरकम् ॥ ३८ ॥
सौवर्चलविडङ्गानि सामुद्रं टङ्कणं समम् ।
विषमुष्टिं सर्वतुल्यं जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥
मरिचाभां वटीं खादेदग्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ३९ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध गन्धक, अजमोद, हरड, आमला, बहेडा, सज्जी, जवाखार, चीतेकी जड, सेंधानमक, जीरा, कालानमक, वाय, विडंग, सामुद्र-नमक और सुहागा ये सब समान भाग और शुद्ध कुचला सबकी बराबर भाग लेवे । सबको एकत्र कूट पीसकर जम्बीरीनींबुके रसमें खरल करके काली मिरचकी