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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 411

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३७९

अदरखके रसमें भावना देवे तो यह वृहदग्निमुखचूर्ण सिद्ध होता है। यह चूर्ण जठरा-
ग्निको प्रज्वलित अग्निकी समान अत्यन्त दीपन करता है ॥ १५-२० ॥

उपयुक्तविधानेन नाशयत्यचिराद् गदान् ।
अजीर्णकमथो गुल्मान् प्लीहानं गुदजानि च ॥ २१ ॥
उदराण्यन्त्रवृद्धिं च अष्ठीलां वातशोणितम् ।
प्रणुदत्युल्बणान् रोगान् नष्टमग्निं प्रदीपयेत् ॥ २२ ॥
समस्तव्यञ्जनोपेतं भक्तं कृत्वा सुभाजने ।
दापयेदस्य चूर्णस्य बिडालपदमात्रकम् ॥
गोदोहमात्रात्तत्सर्वं भस्मीभवति सोष्मकम् ॥ २३ ॥

इसको उपयुक्त विधिसे सेवन किया जाय तो यह अजीर्ण, गुल्म, प्लीहा, अर्श, उदररोग, आन्त्रवृद्धि, अष्ठीला, वातरक्त और अत्यन्त उल्बण दोष इन समस्त रोगोंको बहुत जल्द नष्ट करता है । एवं नष्टहुई अग्निको पुनः दीपन करता है । सम्पूर्ण व्यंजनोंसे युक्त भातको सुन्दर थालमें रखकर उसमें चूर्ण डालकर भक्षण करे तो गोदोहन कालमें जितना समय लगता है उतन समयमें अर्थात् तत्कालही खाया हुआ भोजन सब भस्म होजाता है अर्थात् पच जाता है ॥ २१-२३ ॥

अग्निमुखलक्षण ।

चित्रकं त्रिफला दन्ती त्रिवृता पुष्करं समम् ।
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रं तु सैन्धवम् ॥ २४ ॥
भावयित्वा स्नुहीक्षीरैस्तत्काण्डे निक्षिपेत्ततः ।
मृदुपङ्कनानुुलिप्तं प्रक्षिपेज्जातवेदसि ॥ २५ ॥
सुदग्धं तु समुद्धृत्य सचूर्ण्योष्णाम्बुना पिबेत् ।
एतदग्निमुखं नाम लवणं वह्निकृत्परम् ॥
यकृत्प्लीहोदरानाहगुल्मार्शःपार्श्वशूलनुत् ॥ २६ ॥

चीतेकी जड, हरड, आमला, बहेडा, दन्तीकी जड, निसोत और पुहकरमूल इन सबका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णकी बराबर भाग सेंधानमकका चूर्ण लेवे । फिर सबको एकत्र थूहरके दूधमें अच्छीतरह खरल करके एक थूहरके डंडेमें भरकर ऊपरसे कपरोटी करके अग्निमें पुटपाक की विधिसे पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पक जाय तब उसको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस अग्निमुखनामक लवणको