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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 406 of 1416

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Page 406
३७४भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

वटो वेशवाराल्लवङ्गेन फेनी समं पर्पटः शिग्रुबीजेन याति ।
कणामूलतो लड्डुकापूपसठ्यादिपाको भवेत्तण्डुलीमण्डयोश्च ॥

गेहूँ, उरद, चने, मटर और मूँग इन सबका अजीर्ण धतूरेके बीजोंको सेवन कर-नेसे शीघ्र दूर होता है। पिण्डखजूर, भसींडा, कशेरु, मिश्री, सिंघाडे और छुहारेके अजीर्णम नागरमोथेका सेवन उत्तम है। कंगनी, समा, नीवारधान और कुलथी ये अन्न दहीके पानीके सेवनसे शीघ्र जीर्ण होजाते हैं और कांजीके सेवनसे सर्व प्रकारके दो दलवाले अन्न पचजाते हैं। पिष्टान्न (पिट्ठिके बने मिष्टान्नादि) पदार्थोंके अजीर्णमें शीतलजल और खिचडीके अजीर्णमें सैंधानमक सेवन करना चाहिये। इमरतीके अजीर्णको कागजी नींबूका रस और खीरको मूँगका यूष पचादेता है। बडे वेशवार (मसाले) चरपटे सेवन करनेसे और फेनी लौंगके सेवन करनेसे पचती है। पापडका अजीर्ण सहिंजनेके बीजोंको खानेसे दूर होता है। लड्डुओंके अजीर्णमें पीपलामूलका चूर्ण गरम जलके साथ सेवन करना चाहिये। मालपुये और सठ्यकादि अजीर्णमें तिलमिश्रित यवागू सेवन करना चाहिये ॥ ११-१४ ॥

विषूचिकाकी चिकित्सा।

विषूचिकायां वमितं विरिक्तं सुलङ्घितं वा मनुजं विदित्वा ।
पेयादिभिर्दीपनपाचनैश्च सम्यक् क्षुधार्त्तं समुपक्रमेत ॥ १ ॥
विषूचिका (हैजा) म वमन, विरेचन और लंघन करानेके पश्चात रोगीको अच्छे प्रकारसे भूख लगनेपर अग्निप्रदीपक और दोषोंको पचानेवाले पेयादि हल्का पथ्य देना चाहिये ॥ १ ॥

जलपीतमपामार्गमूल हन्ति विषूचिकाम् ॥ २ ॥
चिरचिटेकी जडको जलमें पीसकर सेवन करनेसे विषूचिकरोग दूर हो ॥ २ ॥

कुष्ठसैन्धवयोः कल्कं चुक्रतैलसमन्वितम् ।
विषूच्या मर्दनं कोष्णं खल्लीशूलनिवारणम् ॥ ३ ॥
विषूचिकामें कूठ और सैंधानमकके चूर्णको चुक और तिलके तेलमें मिलाकर गरम करके सुहाता २ पेटपर लेप करनेसे खलीशूल दूर होताहै ॥ ३ ॥

व्योषं करञ्जस्य फलं हरिद्रा-
मूलं समावाप्य च मातुलुङ्ग्याः ।
छायाविशुष्का गुडिकाः कृतास्ता
हन्युर्विषूचीं नयनाञ्जनेन ॥ ४ ॥