Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 382 of 1416

Read in context
Page 382

३५० भैषज्यरत्नावली । [अर्शोरोग-


त्रिवृत्तेजोवतीकन्दचित्रकान् द्विपलांशिकान् ।
एलात्वङ्मरिचं चापि गजाह्वां चापि षट्पलाम् ॥ २ ॥
द्वात्रिंशत्पलमेवात्र चूर्णं दत्त्वा निधापयेत् ।
ततो मात्रां प्रयुञ्जीत जीर्णे क्षीररसाशनः ॥ ३ ॥

निसोत, चव्य, दन्ती, गोखरू, चीतेकी जड, कचूर, इन्द्रायन, नागरमोथा, बेलगिरी, वायविडङ्ग और हरड ये प्रत्येक ४-४ तोले, भिलावे ३२ तोले, विधारेकी जड २४ तोले और जिमीकन्द ६४ तोले लेवे। इन सबको एकत्रकर दो द्रोण ५१२ पल परिमाण जलमें पकावे। जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर इस क्वाथमें क्वाथसे तिगुना पुराना गुड मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे। जब पकते पकते करछीसे समस्त लेह चिपकने लगे तब नीचे उतारकर उसमें निसोत, चव्य, जिमीकन्द और चीतेकी जड इन प्रत्येकका चूर्ण ८८ तोले एवं छोटी इलायची, दालचीनी, कालीमिरच और गजपीपल प्रत्येकका चूर्ण २४-२४ तोले लेकर मिलादेवे (उक्त औषधियोंकी मात्रा निश्चितकर दीगई है तथापि "द्वात्रिंशत्पलम्" यह पद जो कहा गया है वह कहीं कहीं व्यवधान रहित निर्देश करनेपर भी प्रत्येक औषध समभाग नहीं है यह बतलानेके लिये है।) फिर अपनी शक्तिके अनुसार मात्र निर्धारित करके सेवन करे औषधके जीर्ण होनेपर दूध और मांसरस भक्षण करे ॥ ९८-१०३ ॥

पञ्च गुल्मान् प्रमेहांश्च पाण्डुरोगं हलीमकम् ।
जयेदर्शांसि सर्वाणि तथा सर्वोदराणि च ॥ ४ ॥
दीपयेद् ग्रहणीं मन्दां यक्ष्माणं चापकर्षति ।
पीनसे च प्रतिश्याये आढ्यवाते तथैव च ॥ ५ ॥
अयं सर्वगदेष्वेव कल्याणो लेह उत्तमः ।
दुर्नामारिरयं चाशु दृष्टो वारसहस्रशः ॥ ६ ॥
भवन्त्येनं प्रयुञ्जानाः शतवर्षं निरामयाः ।
आयुषो दैर्घ्यजननो वलीपलितनाशनः ॥ ७ ॥
रसायनवरश्चैव मेधाजनन उत्तमः ।
गुडः श्रीबाहुशालोऽयं दुर्नामारिः प्रकीर्त्तितः ॥ ८ ॥