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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 380 of 1416

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Page 380
३४८भैषज्यरत्नावली[अर्शोरोग-

ग्रहणीमार्दवं कार्श्यं श्वयथुं कामलामपि ।
अनुपानं घृतं दद्यान्मधु तकं जलं पयः ॥
रोगानीकविनाशाय कौटजो लेह उत्तमः ॥ ८९ ॥

यह लेह रुधिरकी बवासीर एवं वात पित्त और कफ इन प्रत्येकसे उत्पन्न हुई अथवा त्रिदोषोत्पन्न बवासीर तथा अन्यान्य सर्वप्रकारकी जो दुस्तर व्याधियाँ उन सबको तथा अम्लपित्त, अतिसार, पाण्डुरोग, अरुचि, ग्रहणीकी मृदुता, कृशता, सूजन और कामलारोगको तत्काल नष्ट करता है । इसपर घृत, शहद, मट्ठा, जल और दूध इन पदार्थोंका अनुपान करना चाहिये । यह कुटज अवलेह रोगसमूहकों नष्ट करनेके लिये सर्वश्रेष्ठ है ॥ ८७-८९ ॥

कुटजरसक्रिया ।

कुटजत्वचो विपाच्यं शतपलमार्द्रं महेन्द्रसलिलेन ।
यावत् सान्द्ररसं तद् द्रव्यं स्वरसस्ततो ग्राह्यः ॥ ९० ॥
मोचरसः ससमङ्गा फलिनी च पलांशिकास्त्रिभिस्तैश्च ।
वत्सकबीजं तुल्यं चूर्णीकृतमत्र दातव्यम् ॥ ९१ ॥
पूतोत्कथितः सान्द्रः सरसो दर्वीप्रलेपनो ग्राह्यः ।
मात्रा कालोपहिता रसक्रियैषा जयत्यसृक्स्रावम् ॥॥ ९२॥
छगलीपयसा युक्ता पेया मण्डेन वा यथाऽग्निबलम् ।
जीर्णौषधश्च शालीन् पयसा च्छागस्य भुञ्जीत ॥९३॥
रक्तार्शांस्यतिसारं शूलं सासृग्रजो निहन्त्याशु ।
बलवच्च रक्तपित्तं रसक्रियैषा ह्युभयभागम् ॥ ९४ ॥

गीली कुडेकी छालको सौ पल लेकर वर्षाके एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते २ जल गाढा होजाय तब उसको नीचे उतार छानकर रस निकाले फिर उस रसमें मोचरस, लज्जावन्ती और फूलप्रियंगु इन प्रत्येकका चूर्ण ४-४ तोले और इन्द्रजौका चूर्ण १२ तोले मिलाकर पकावे जब पकते २ गाढा होजाय और करछीसे लगने लगे तब उसको नीचे उतार लेवे । फिर इस रस-क्रियामात्राको समयानुसार निर्द्धारितकर और अपनी अग्निके बलाबल विचार-कर बकरीके दूध अथवा मांडके साथ सेवन करे तो यह कुटज रसक्रिया तत्काल रक्तस्रावको वन्द करती है । इस औषधिके जीर्ण होजानेपर बकरीके दूधके साथ शालिधानोंके चावलोंका भात खावे । यह औषधि रक्तज बवासीर,