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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 378 of 1416

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Page 378

३४६ | भैषज्यरत्नावली । | [अर्शोरोग-

पिष्ट्वा च गुडिकां कृत्वा बदरास्थिसमां बुधः ।
एकैकां तां समुद्धृत्य रोगे रोगे पृथक् पृथक् ॥ ७६ ॥

हरड, आमला, बहडा, सेंधानमक, विरियासंचरनमक, समुद्रनमक, सांभर, कालानमक, कूठ, कुटकी, देवदारु, वायविडङ्ग, नीमके फल (निबौली), खिरेंटी, हल्दी, दारुहल्दी और हुलहुल इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णको करंजकी छालके क्वाथमें खरल करके बेरकी गुठलीकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंमस एक एक गोली पृथक् २ रोगोंमें अलग २ अनुपानोंके साथ सेवन करनी चाहिये ॥ ७४–७६ ॥

उष्णेन वारिणा पीता शान्तमग्निं प्रदीपयेत् ।
अशांसि हन्ति तक्रेण गुल्ममम्लेन निहरेत् ॥ ७७ ॥
जन्तुदष्टे तु तोयेन त्वग्दोषं खदिराम्बुना ।
मूत्रकृच्छ्रं तु तोयेन हृद्रोगे तैलसयुता ।
इन्द्रस्वरससंयुक्ता सर्वज्वरविनाशिनी ॥ ७८ ॥
मातुलुङ्गरसेनाथ सद्यः शूलहरी स्मृता ।
कपित्थतिन्दुकानां तु रसेन सह मिश्रिता ॥
विषाणि हन्ति सर्वाणि पानाशनप्रयोगतः ॥ ७९ ॥
गोशकृद्रससंयुक्ता हन्यात् कुष्ठानि सर्वशः ।
श्यामाकषायसहिता जलोदरविनाशिनी ॥ ८० ॥
भक्तच्छन्दं जनयति भुक्तस्योपरि भक्षिता ।
अक्षिरोगेषु सर्वेषु मधुना घृष्य चाञ्जयेत् ॥ ८१ ॥
लेहमात्रेण नारीणां सद्यः प्रदरनाशिनी ।
व्यवहारे तथा द्यूते संग्रामे मृगयादिषु ॥
समालभ्य नरो ह्येनां क्षिप्रं विजयमाप्नुयात् ॥ ८२ ॥

यह वटी गरम जलके साथ सेवन करनेसे मन्दाग्निको दीपन करती है। एवं मठ्ठेके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारकी बवासीर और काँजीके साथ सेवन करनेसे गुल्मरोग, शितल जलके साथ खानेसे विषैले जीवोंका काटा हुआ विष, खैरके काढ़ेके साथ खानेसे त्वचाके रोग, जलके साथ सेवन करनेसे मूत्रकृच्छ्र, तिलके तेलके साथ सेवन करनेसे हृदयरोग, वर्षाके जलके साथ प्रयोग कर-