भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextभैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
कहते हैं और जो रोग औषधके द्वारा शान्त नहीं होते, उनको असाध्य कहते हैं। याप्य और असाध्य ये दोनों प्रकारके रोग असाध्य हैं। उपर्युक्त समयमें चिकित्सा न करनेसे साध्यरोगभी याप्य हो जाते हैं और याप्यरोग असाध्य हो जाते हैं और असाध्य रोग जीवनको शीघ्र नष्ट करदेते हैं। याप्यरोग दो प्रकारसे उत्पन्न होते हैं। कितनेएक रोग स्वभावसे ही याप्य और कितनेएक चिकित्साके अभावसे याप्य हो जाते हैं। किन्तु स्वभावसे जो रोग याप्य होते हैं वे असाध्य और चिकित्साके अभावसे जो रोग याप्य होते हैं, उनमेंसे कोई चिकित्साद्वारा साध्य होजाते हैं॥११-१३॥
तत्रैकः पापजो व्याधिरपरः कर्मजो मतः ।
पापजः प्रशमं याति भैषज्यसेवनादिना ॥ १४ ॥
यथाशास्त्रविनिर्णीतो यथा व्याधिश्चिकित्सितः ।
न शमं याति यो व्याधिः स ज्ञेयः कर्म्मजो बुधैः ॥ १५ ॥
न जन्तुः कश्चिदमरः पृथिव्यामेव जायते ।
अतो मृत्युरवार्यः स्यात्किन्तु रोगो निवार्यते ॥ १६ ॥
पापज और कर्मज-इन भेदोंसे रोग दो प्रकारके होते हैं। पापजरोग औषधादिके सेवनसे शान्त होजाते हैं। एवं शास्त्रोक्त औषधादिके सेवनसे भी जो रोग दूर नहीं होते, उनको कर्मज व्याधि कहते हैं। इस पृथ्वीपर कोई भी जीव अमर होकर नहीं जन्मा, एक न एक दिन निश्चयही मृत्यु होगी। इसलिये मृत्युको कोई भी नहीं रोक सकता, किन्तु औषधादिके द्वारा रोग दूर किया जा सकता है ॥ १४-१६ ॥
एकोत्तरं मृत्युशतमस्मिन्देहे प्रतिष्ठितम् ।
तत्रैकः कालसंयुक्तः शेषास्त्वागन्तवः स्मृताः ॥१७॥
ये त्विहागन्तवः प्रोक्तास्ते प्रशाम्यन्ति भेषजैः ।
जपहोमप्रदानैश्च कालमृत्युर्न शाम्यति ॥ १८ ॥
पीडितं रोगसर्पाद्यैरपि धन्वन्तरिः स्वयम् ।
सुस्थीकर्तुं न शक्नोति कालप्राप्तं हि देहिनम् ॥ १९ ॥
मनुष्यकी एकसौ एक प्रकारसे मृत्यु हो सकती हैं। उनमें एक कालमृत्यु और सौ आगन्तुक मृत्युयें हैं। आगन्तुक मृत्यु-औषध और जप, होमादिके द्वारा शमन