भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context'चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३२५
छोटी न बडी ) हो ऐसी मूली ६४ इन सबको धोयहुए स्वच्छ घड़ेमें डालकर एक द्रोण परिमाण जल भर देवे । फिर उस घड़ेमें जवाखार, सज्जी, तुम्बुरु, अजवायन, धनियां, विरियासंचरनमक, सेंधानमक, कालानमक, हींग, वंशलोचन और चव्य प्रत्येक औषधि आठ आठ तोले, पीपल, जीरा, राई, सफेद सरसों, काला जीरा और चीतेकी जड ये प्रत्येक चार चार तोले सबको बारीक पीसकर डालदेवे । फिर घड़ेके मुँहको सिकोरेसे अच्छे प्रकार बन्द करके धानोके ढेरमें १५ दिनतक गडा रक्खे । तदनन्तर उसको निकालकर यथोचित मात्रासे सेवन करे तो इससे शरीरमें बल वर्ण और आयुकी वृद्धि होती है । यह अत्यन्त बलके देनेवाली है ॥ १००-१०३॥
कान् जीवयामीति यतः प्रवृत्त-
स्तत् काञ्जिकेति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।
आयामकालाज्जरयेच्च भुक्त-
मायामिकेति प्रवदन्ति चैनम् ॥ १०४ ॥
दकोदरं गुल्ममथ प्लीहानं हृद्रोगमानाहमरोचकं च ।
मन्दाग्नितां कोष्ठगतं च शूलमर्शोविकारान् सभगन्दरांश्च ॥
वातामयानाशु निहन्ति सर्वान्न संसेव्यमानं विधिवन्नराणाम् ॥
जब कोई चिकित्सक सब ओषधियोंसे निराश होकर यह विचारता है कि, रोगीकी किस प्रकार जीवरक्षा करूं तब उस समयके लिये आयुर्वेदाचार्य महर्षिगण आयामिकाञ्जिककोही बतलाते हैं । आयाम शब्दका अर्थ-१ प्रहर । यह १ प्रहरमें खाये हुए भोजनको पचादेता है, इसलिये इसको विद्वान्लोग आयामिकाञ्जिक कहते हैं । यह उदररोग, गुल्म, प्लीहा, हृदयरोग, आनाह, अरुचि, मन्दाग्नि, कोष्ठगतशूल, अर्श, भगन्दर, वातरोग एवं अन्यान्य सर्वप्रकारके रोगोंको शीघ्र दूर करता है ॥ १०४॥१०६॥
अष्टपलघृत ।
त्र्यूषणत्रिफलाकल्के बिल्वमात्र गुडात्पले ।
सर्पिषोऽष्टपलं पक्त्वा मात्रां मन्दानलः पिबेत् ॥ १ ॥
सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला और बहेडा इनका कल्क समान भाग मिश्रित चार तोले, गुड चार तोले और घी ३२ तोले लेवे । सबको एकत्र मिलाकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इसको रोगीकी अवस्था और अग्निके वलाबलाको