Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 34 of 1416

Read in context
Page 34

२ भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-

स्तुति करतेहुए देवताओंके नम्रहुए शिरोंके किरीटसे शोभायमान और नीलकमलकी कान्तिको लज्जित करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलको प्रणामकर मैं गोविन्ददास (ग्रन्थकार) वैद्योंकी प्रसन्नताके लिये अनेक ग्रन्थरूपी समुद्रोंको मथकर निकालेहुए नानाप्रकारके गुणोंसे युक्त इस "भैषज्यरत्नावली" नामक ग्रन्थको प्रकाशित करता हूँ ॥ ३ ॥

यदि प्रियतमा न स्याद् वृद्धानां भिषजामियम् ।
तथाऽपि नव्या नव्थानामानुकूल्यं विधास्यति ॥ ४ ॥

यद्यपि मेरा संग्रह कियाहुआ यह नवीन ग्रन्थ वृद्धवैद्योंको अतिप्रिय न होगा तथापि यह नवीन वैद्योंका विशेष उपकार करेगा, इसमें सन्देह नहीं ॥ ४ ॥

आयुर्वेदके लक्षण ।

आयुर्हिताहितं व्याधेर्निदानं शमनं तथा ।
विद्यते यत्र विद्वद्भिः स आयुर्वेद उच्यते ॥ ५ ॥

जिस शास्त्रके द्वारा आयुका हित व अहित एवं रोगोंका निदान और रोग नाश करनेके उप.य मालूम हों, उसको आयुर्वेद कहते हैं ॥ ५ ॥

आयुर्वेदकी निरुक्ति ।

अनेन पुरुषो यस्मादायुर्विन्दति वेत्ति च ।
तस्मान्मुनिवरैरेष आयुर्वेद इति स्मृतः ॥ ६ ॥

इस शास्त्रके द्वारा दीर्घायु प्राप्त होती है और आयुर्विषयक ज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिये महर्षियोंने इसको आयुर्वेद कहा है ॥ ६ ॥

आयुर्वेदकी उत्पत्ति ।

ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत् ।
सोऽश्विनौ तौ सहस्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकान्मुनीन् ॥
तेऽग्निवेशादिकाँस्ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिरे ॥ ७ ॥

सबसे प्रथम ब्रह्माने दक्ष प्रजापतिको आयुर्वेदकी शिक्षा दी; फिर दक्षने दोना अश्विनीकुमारोंको, अश्विनीकुमारोंने इन्द्रको, इन्द्रने आत्रेय आदि मुनियोंको और उन्होंने अग्निवेशादि मुनियोंको आयुर्वेदकी शिक्षा दी। फिर उन अग्निवेशादि मुनियोंने संसारके हितके लिये अपने अपने नामोंसे पृथक पृथक् तन्त्रोंकी रचना की ॥ ७ ॥