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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 336 of 1416

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Page 336
३०४भैषज्यरत्नावली ।[ग्रहणी-

नष्ट करती है। और बहुत दिनोंसे नष्ट हुई अग्निको तत्काल दीपन करती है। इसपर बासी अन्न, मांस, दही, काँजी, छाछ, मछली, चूका और तेल ये पदार्थ यथेच्छरूपंसे सेवन करना चाहिये। एवं सिंघाडे, बेलगिरी, गुड, जलचौलाई, नारियल, दूध और सब प्रकारकी दालें इनको त्याग देना चाहिये ॥ ९६-९८ ॥

श्रीनृपतिवल्लभ रस ।

जातीफललवङ्गाब्दत्वगेला टङ्करामठम् ।
जीरकं तेजपत्रं च यमानी विश्वसैन्धवम् ॥ ९९ ॥
लौहमभ्रं रसो गन्धस्ताम्रं प्रत्येकशः पलम् ।
मरिचं द्विपलं दत्त्वा छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ ३०० ॥
धात्रीरसेन वा पेष्यं वटिकां, कुरु यत्नतः ।
श्रीमद्गहननाथेन विचिन्त्य परिनिर्मितः ॥ १ ॥
सूर्यवत्तेजसा चायं रसो नृपतिवल्लभः ।
अष्टादशवटीं खादेत् पवित्रः सूर्यदर्शकः ॥ २ ॥

जायफल, लौंग, नागरमोथा, दालचीनी, इलायची, सुहागा, हींग, जीरा, तेजपात, अजवायन, सोंठ, सेंधानमक, लोहा, अभ्रक, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और ताँबेकी भस्म ये प्रत्येक चार चार तोले एवं काली मिरचोंका चूर्ण ८ तोले लेकर सबको एकत्र बकरीके दूधमें खरल करे फिर आमलोंके रसमें खरल करके उचित मात्रासे गोलियाँ तैयार करलेवे। नृपतिवल्लभनामक यह रस सूर्यके समान तेजवाला है। इसकी प्रतिदिन प्रातःकाल शौचादिसे शुद्ध होकर अठारह गोली सेवन करे ॥ ९९-३०२ ॥

हन्ति मन्दानलं सर्वमामदोषं विषूचिकाम् ।
प्लीहगुल्मोदराष्ठीलायकृत्पाण्डुत्वकामलाम् ॥ ३०३ ॥
हृच्छूलं कुक्षिशूलं च पार्श्वशूलं तथैव च ।
कटिशूलं कुक्षिशूलमानाहमष्टशूलकम् ॥ ३०४ ॥
कासश्वासामवातांश्च श्लीपदं शोथमर्बुदम् ।
गलगण्डं गण्डमालामम्लपित्तं च गर्दभीम् ॥ ३०५ ॥
कृमिकुष्ठानि दद्रूणि वातरक्तं भगन्दरम् ।
उपदंशमतीसारं ग्रहण्यर्शःप्रमेहकम् ॥ ३०६ ॥