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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 324 of 1416

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Page 324

२९२ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-

क्षये ज्वरे चार्शसि षट्प्रकारे मान्द्यातिसारेऽरुचिपीनसेषु ।
मेहे च कृच्छ्रे गतधातुवर्द्धने गुञ्जाद्वयं चास्य महामयघ्नम् १३॥

इस रसको वाताधिक्य संग्रहणीमें मिरचोंके चूर्ण और घीके साथ तथा पित्ताधिक्य संग्रहणीमें शहद और पीपलके चूर्णके साथ और कफाधिक्य संग्रहणीमें भाँगके रस अथवा घृतमिश्रित त्रिकुटके चूर्णके साथ सेवन करना चाहिये । एवं मन्दाग्नि, क्षय, ज्वर, छः प्रकारकी बवासीर, अतिसार, अरुचि, पीनस, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्रादि रोगोंमें और नष्ट हुई धातुकी वृद्धिके लिये इसका प्रयोग करना चाहिये । यह रस बडी बडी दुस्तर व्याधियोंको नष्ट करता है ॥ १२ ॥ १३ ॥

ग्रहणीगजेन्द्रवटिका ।

रसगन्धकलौहानि शङ्कटङ्गणरामठम् ।
शठीतालीशमुस्तानि धान्यजीरकसैन्धवम् ॥ १४ ॥
धातक्यतिविषा शुण्ठी गृहधूमो हरीतकी ।
भल्लातकं तेजपत्रं जातीफललवंगकम् ॥ १५ ॥
त्वगेला बालकं बिल्वं मेथी शक्राशनस्य च ।
रसैः सम्मर्द्य वटिका रसवैद्येन कारिता ॥ १६ ॥
माषद्वयां वटीं खादेच्छागीदुग्धानुपानतः ।
वयोऽग्निबलमावीक्ष्य युक्त्या वा त्रुटिवर्द्धनम् ॥ १७ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंकी कजली एवं लोहभस्म, शंखभस्म, सुहागा, हींग, कचूर, तालीसपत्र, नागरमोथा, धनियाँ, जीरा, सेंधानमक, धायके फूल, अतीस सोंठ, घरका धुआँ, हरड, भिलावें, तेजपात, जायफल, लौंग, दालचीनी, इलायची, सुगन्धवाला, बेलगिरी और मेथी इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर भाँगके रसमें खरल करके दो दो माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इसको अवस्था और अग्निके बलाबलका विचारकर मात्राको न्यूनधिकता करके बकरीके दूधके साथ सेवन करना चाहिये ॥ १४-१७ ॥

ग्रहणीं विविधां हन्ति ज्वरातीसारनाशिनी ।
शूलगुल्माम्लपित्तांश्च कामलां च हलीमकम् ॥ १८ ॥
बलवर्णाग्निजननी सेविता च चिरायुषे ।
कण्डूं कुष्ठं विसर्पं च गुदभ्रंशं कृमिं जयेत् ॥ १९ ॥