भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| २८० | भैषज्यरत्नावली । | [ ग्रहणी- |
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दृष्टिप्रसादनं चैव नारीणां चैव पुत्रदः ।
भाषितः कामदेवेन मेथीमोदकसंज्ञकः ॥ ३१ ॥
अग्निका बलाबल विचारकर इन मोदकोंको कुछेक घृत और शहद मिलाकर सेवन करना चाहिये । यह मोदक अग्निको अत्यन्त दीपन करते हैं और आमयुक्त मेदरोगकी अत्युत्तम औषधि हैं । बल और वर्णको बढ़ानेवाले तथा संग्रहणीको हरनेवाले हैं । एवं बीसप्रकारके प्रमेह, मूत्राघात, पथरी, पाण्डुरोग, खाँसी, राजयक्ष्मा और कामलारोगको दूर करते हैं । इनको सेवन करनेसे स्त्रियोंके गिरेहुए स्तन ताड़के फलके समान दृढ़ होजाते हैं । ये मोदक दृष्टिशक्तिको बढ़ानेवाले तथा स्त्रियोंको पुत्रके देनेवाले हैं । इनको भी कामदेवने वर्णन किया है और यह मेथीमोदक नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ २८-३१ ॥
बृहन्मेथीमोदक ।
त्रिफला धान्यकं मुस्तं शुण्ठी मरिचपिप्पली ।
कट्फलं सैन्धवं शृंगी जीरकद्वयपुष्करम् ॥ ३२ ॥
यमानी केशरं पत्रं तालीशं विडमेव च ।
जातीफलं त्वगेला च जावित्रीन्दुलवंगकम् ॥ ३३ ॥
शतपुष्पा मुरामांसी यष्टीमधुकपद्मकम् ।
चव्यं मधुरिका दारु सर्वमेतत् समं भवेत् ॥ ३४ ॥
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रा तु मेथिका ।
सितया मोदकं कार्यं घृतमाध्वीकसंयुतम् ॥ ३५ ॥
हरड, आमला, बहेडा, धनियाँ, नागरमोथा, सोंठ, मिरच, पीपल, कायफल, सैंधानमक, काकडासिंगी, जीरा, कालाजीरा, पुहकरमूल, अजवायन, नागकेशर, तेजपात, तालीसपत्र, बिरियासंचरनमक, जायफल, दालचीनी, इलायची, जावित्री, कपूर, लौंग, सोया, मुरामांसी, मुलहठी, पद्माख, चव्य, सौंफ और देवदारु इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे, फिर समस्त चूर्णके बराबर मेथीका चूर्ण और मेथीके चूर्णसहित सब चूर्णके समान भाग मिश्री एवं यथोचित परिमाणसे घृत और शहद मिलाकर लड्डू बनालेवे ॥ ३२-३५ ॥
भक्षयेत् प्रातरुत्थाय यथादोषानुपानतः ।
हन्ति मन्दानलान् सर्वानामदोषं विशेषतः ॥ ३६ ॥