Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 309 of 1416

Read in context
Page 309

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २७७


शाल्मल्यङ्घ्रि फलत्रिकं कपिभवं बीजं समं चूर्णयेत्
चूर्णीशा विजया सिता द्विगुणिता मध्वाज्ययोः पिंडितम्
कर्शांशा गुडिकाऽर्द्धकर्षमथवा सेव्याः सदा कामिभिः
सेव्यं क्षीरसितं सुवीर्य्यकरणं स्तम्भेऽप्ययं कामिनाम् ।
वामावश्यकरः सुखातिसुखदो बह्वङ्गनाद्रावणः
क्षीणे पुष्टिकरः क्षतक्षयहरो हन्याच्च सर्वामयान् ॥ १३ ॥
कासश्वासमहातिसारशमनः कामाग्निसन्दीपनो
दुर्नामग्रहणीप्रमेहनिवहश्लेष्मातिरेकप्रणुत् ।
नित्यानन्दकरो विशेषकवितां वाचां विलासोद्भवो
धत्ते सर्वगुणं महास्थिरमतिर्वालो नितान्तोत्सवः ॥ १४ ॥
अभ्यासेन निहन्ति मृत्युपलितं कामेश्वरो वत्सरात्
सर्वेषां हितकारिणा निगदितः श्रीनित्यनाथेन सः ।
वृद्धानां मदनोदयोदयकरः प्रौढाङ्गनासङ्गमे
सिंहोऽयं समदृष्टिप्रत्ययकरो भूपैः सदा सेव्यताम् ॥ १५ ॥

उत्तम प्रकारसे शुद्ध की हुई अभ्रककी भस्म, कायफल, कूठ, असगन्ध, गिलोय, मेथी, मोचरस, विदारीकंद, मूसली, गोखरू, तालमखाना, केलेकी जड, शतावर, अजमोद, बालछड, तिलोंके चावल, धनियाँ, मुलहठी, गंगेरन, कचूर, मैनफल, जायफल, सैंधानमक, भारंगी, काकड़ासिंगी, सोंठ, पीपल, मिरच, जीरा, कालाजीरा, चीतेकी जड, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागकेशर, पुनर्नवा, गजपीपल, दाख, गन्धपलाशी, सुगन्धवाला, सेमलकी मूसली, हरड, आमला, बहेडा और कौंचके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । सम्पूर्ण चूर्णकी बराबर भाँगका चूर्ण और सबसे दूनी मिश्री लेवे । सबको यथोचित मधु और घृतमें विधिपूर्वक मिलाकर एक तोलाके अथवा छः माशके लड्डू बनालेवे । ये मोदक कामीपुरुषोंको प्रतिदिन दूध और मिश्रीक साथ सेवन करने चाहिये । ये मोदक अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, स्तम्भक, स्त्रीको वशमें करनेवाले, अत्यन्त आनन्ददायक, अनेक स्त्रियोंमें रमणकी शक्तिप्रदायक, क्षीण शरीरको पुष्ट करनेवाले, कामाग्निको बढानेवाले तथा क्षतक्षय, खाँसी श्वास, प्रबल अतिसार, अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कफविकार एवं अन्यान्य सर्वप्रकारके उपद्रवोंको तत्काल नष्ट करते हैं । नित्य आनन्ददायक, विशेषकर कवित्वशक्ति और वाक्शक्तिको बढानेवाले हैं । इन कामेश्वर मोद-