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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 301 of 1416

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६९

शुद्धगन्धक एक तोला और शुद्धपारा ६ माशे इन दोनोंको एकत्र मिलाकर कज्जली बनालेवे । फिर सोंठ, मिरच, पीपल ये प्रत्येक दो दो तोले एवं पाँचों नमक डेढ डेढ तोले और भाँगका चूर्ण साढे आठ तोले लेवे । इन सबको एकत्र मिलाकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन चार माशे परिमाण सेवन करे और पीछेसे एक पल कांजीको पान करे । इसके सेवन करनेसे मन्दहुई अग्नि अत्यन्त दीपन होती है । एवं वातज, पित्तज और कफज भयंकर अतिसार, खाँसी, श्वास, शूल, ज्वर, उदररोग, राजयक्ष्मा, प्लीहा, आमवात, छः प्रकारके गुदाके रोग, सम्पूर्ण कुष्ठरोग, वातरक्त और कण्ठरोग ये सब तत्काल नष्ट होते हैं । इसपर यथेच्छ भोजन करना चाहिये ॥ ५८ ॥ ५९ ॥

बृहन्नायिकाचूर्ण ।

चित्रकं त्रिफला व्योषं विडंगं रजनीद्वयम् ।
भल्लातकं यमानी च हिंगुर्लवणपञ्चकम् ॥ ६० ॥
गृहधूमो वचा कुष्ठं घनमभ्रकगन्धकम् ।
क्षारत्रयं चाजमोदा पारदो गजपिप्पली ॥ ६१ ॥
अमीषां चूर्णकं यावत् तावच्छक्राशनस्य च ॥ ६२ ॥
अभ्यर्च्य नायिकां प्रातर्योगिनीं कामरूपिणीम् ।
बिडालपदमात्रं तु भक्षयेदस्य गुण्डकम् ॥ ६३ ॥

चीतेकी जड, हरड, आमला, बहेडा, सोंठ, पीपल, मिरच, वायविडङ्ग, हल्दी, दारुहल्दी, भिलावे, अजवायन, हींग, पाँचों नमक, घरका धुआँ, वच, कूट, नागरमोथा, अभ्रक, शुद्ध, गन्धक, जवाखार, सज्जी, सुहागा, अजमोद, शुद्धपारा और गजपीपल इन सबको समान भाग लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली बनालेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर चूर्ण करलेवे । फिर इन औषधियोंका जितना चूर्ण हो, उसीकी बराबर भांगका चूर्ण मिलाकर सबको एकभूएक करके एक उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल कामरूपधारिणी योगिनीकी पूजा कर इस चूर्णको एकएक तोला परिमाण भक्षण करे । इसपर कांजी, चावलोंका जल, उडदका यूष, अभ्यङ्ग स्नान, मांसका भोजन, मट्ठा, भुनीहुई मछली और दही ये सब हितकर हैं ॥ ६०–६३ ॥

मन्दाग्निकासदुर्नामप्लीहपाण्डुचिरज्वरान् ।
प्रमेहशोथविष्टम्भसंग्रहग्रहणीं जयेत् ॥ ६४ ॥