भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 298 of 1416
Read in context२६६ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-
एतानि समभागानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
मधुना वा लिहेच्चूर्णं पिबेत्तण्डुलवारिणा ॥ ४० ॥
सर्वदोषहरं चैव ग्रहणीं हन्ति दुस्तराम् ।
वातिकीं पैत्तिकीं चैव श्लैष्मिकीं सान्निपातिकीम् ॥४१॥
लौंग, अतीस, नागरमोथा, पीपल, मिरच, सेंधानमक, हाऊबेर, धनियां, कायफल, पुहकरमूल, जावित्री, जायफल, कालाजीरा, कालानमक, रसौंत, धायके फूल, मोचरस, पाठ, तेजपात, तालीसपत्र, नागकेशर, चीतेकी जड, बिरियासंचरनमक, तुम्बरु, बेलगिरी, दालचीनी, इलायची, पीपलामूल, अजमोद, अजवायन, लज्जावन्ती, इन्द्रजौ, सोंठ, अनारका बक्कल, जवाखार, नीमकी छाल, राल, सज्जी, समुद्रफेन, सुहागा, सुगन्धवाला, कुडेकी छाल, जामुनकी छाल, आमका छाल, कुटकी, अभ्रककी भस्म, लोहेकी भस्म शुद्ध गन्धक और शुद्ध पारा इन सबके समान भाग लेवे प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली बनावे फिर सबको एकत्र खरल करके बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको शहद अथवा चावलोंके जलके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके रोग, वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषज संग्रहणी नष्ट होती है ॥ ३५–४१ ॥
पक्कापक्कमतीसारं नानावर्णं सवेदनम् ।
कृष्ण।रुणं च पीतं च मांसधावनसन्निभम् ॥ ४२ ॥
ज्वरारोचकमन्दाग्निं कासं श्वासं वमिं तथा ।
अम्लपित्तं तथा हिक्कां प्रमेहं च हलीमकम् ॥ ४३ ॥
पाण्डुरोगं च विष्टम्भमर्शांसि विविधानि च ।
प्लीहगुल्मोदरानाहशोथातीसारपीनसान् ॥ ४४ ॥
आमवातं तथाऽजीर्णे संग्रहग्रहणीं जयेत् ।
उदर प्रदरं चैव लवङ्गाद्यमिदं शुभम् ॥ ४५ ॥
एवं पक्वातिसार, आमातिसार, अनेकवर्णका पीडायुक्त काला, लाल, पीला अथवा मांसके धोवनकी समान अतिसार, ज्वर, अरुचि, मन्दाग्नि, खाँसी, श्वास, वमन, अम्लपित्त, हिचकी, प्रमेह, हलीमक, पाण्डुरोग, विबन्ध, अर्श, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, अफारा, शोथयुक्त अतीसार, पीनस, आमवात, अजीर्ण, दारुण संग्रहणी, उदरविकार और प्रदररोग इन सब व्याधियोंको यह लवंगाद्य चूर्ण तत्काल नष्ट करता है ॥ ४२–४५ ॥