भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context२६४ | भैषज्यरत्नावली । | [ ग्रहणी --
कुटजस्य त्वचश्चूर्णं सर्वचूर्णसमं मतम् ।
एतद्गङ्गाधरं नाम बृहच्चूर्णं महागुणम् ॥ २५ ॥
बेलगिरी, सिंघाडेके पत्ते, अनारके कोमल पत्ते, नागरमोथा, अतीस, राल, धायके फूल, मिरच, पीपल, सोंठ, दारुहल्दी, चिरायता, नीमकी छाल, जामुनकी छाल, रसौंत, इन्द्रजौ, पाठ, लज्जावंती, सुगन्धवाला, मोचरस, भाँग और भांगरा इन सबका चूर्ण समानभाग और समस्त चूर्णकी बराबर कुड़ेकी छालका चूर्ण लेवे । सबको एकत्र बारीक पीसकर कपड़छान करलेवे । इसको प्रतिदिन उचित मात्रासे बकरीके दूध या मांड अथवा शहदके साथ मिलाकर सेवन करे । यह बृहद्गङ्गाधरनामवाला चूर्ण विशेष गुणकारी है ॥ २२–२५ ॥
नानावर्णमतीसारं चिरजं बहुरूपिणम् ।
दुर्वारं ग्रहणीं हन्ति तृष्णां कासं च दुर्जयम् ॥ २६ ॥
ज्वरं च विविधं हन्ति शोथं चैव सुदारुणम् ।
अरुचिं पाण्डुरोगं च हन्यादेव न संशयः ॥
छागीदुग्धेन मण्डेन मधुना वाथ लेहयेत् ॥ २७ ॥
यह चूर्ण विविधप्रकारके, बहुतदिनोंके पुराने और त्रिदोषज अतिसार, दुःसाध्य ग्रहणी, तृषा, प्रबल खाँसी, अनेक प्रकारके ज्वर, दारुण शोथ, अरुचि, पाण्डुरोग आदि व्याधियोंको निस्सन्देह नष्ट करनेवालाहै ॥ २६ ॥ २७ ॥
वृद्धगङ्गाधरचूर्ण ।
मुस्तारलूकशुण्ठीभिर्धातकीलोध्रबालकैः ।
बिल्वमोचरसाभ्यां च पाठेन्द्रयववत्सकैः ॥ २८ ॥
आम्रबीजसमङ्गातिविषाद्युक्तैश्च चूर्णितैः ।
मधुतण्डुलपानीयं पीतं हन्ति प्रवाहिकाम् ॥ २९॥
हन्ति सर्वानतीसारान् ग्रहणीं हन्ति वेगतः ।
वृद्धगङ्गाधरं चूर्णं रुन्ध्याद्गीर्वाणवाहिनीम् ॥ ३० ॥
नागरमोथा, अरलूकी छाल, सोंठ, धायके फल, लोध, सुगन्धवाला, बेलगिरी, मोचरस, पाठ, इन्द्रजौ, कुडेकी छाल, आमकी गुठलीकी मींग, लज्जावंती और अतीस इन सबके समान भाग मिश्रित चूर्णको शहद और चावलोंके जलके साथ सेवन करनेसे प्रवाहिका और सर्वप्रकारके अतीसार नष्ट होते हैं । यह वृद्धगंगाधरचूर्ण गङ्गाके समान वेगवाली संग्रहणीको तत्काल दूर करताहै ॥