भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६३
पश्चात् इस लोकनाथनामक रसको चार चार रत्तीकी मात्रासे शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे सोंठ, अतीस, नागरमोथा, देवदारु और वच इनके क्वाथको पीवे तो इससे सब प्रकारके अतिसार नष्ट होते हैं ॥ २७–२९ ॥
बृहच्चिन्तामणिरस ।
शुद्धसूतं मृतं ताम्रं गन्धकं प्रतिकार्षिकम् ।
चूर्णयेद्विषकषार्द्धं विषाद्धं तिन्तिडीफलम् ॥ १३० ॥
मर्दयेत् खल्लमध्ये तु चाम्ब्लेन गोलकीकृतम् ।
गर्ते षडङ्गुलं कुर्यात् सर्वतो वर्त्तुलं शुभम् ॥ ३१ ॥
नागवल्ल्याः क्षिपेत् पत्रमादौ पात्रे च गोलकम् ।
आच्छाद्य तच्च पत्रेण रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ॥ ३२ ॥
स्वांगशीतं समुद्धृत्य सपत्रं च विशेषतः ।
कर्षाद्धं मरिचं दत्त्वा कर्षाद्धं तिन्तिडीफलम् ॥ ३३ ॥
गुञ्जामितां वटीं कुर्याच्चिन्तामणिरसो महान् ।
अतीसारे त्रिदोषोत्थे संग्रहग्रहणीगदे ॥
अनुपानं विधातव्यं यथादोषानुसारतः ॥ ३४ ॥
शुद्धपारा, ताँबेकी भस्म और शुद्धगन्धक यह प्रत्येक औषधि एकएक कर्ष शुद्ध मीठातेलिया ८ माशे और इमलीका गूदा ३ माशे लेवे । इन सबको एकत्र खरल करके गोलासा बनालेवे । फिर छः अंगुल गहरे और चारोंओरसे गोल ऐसे एक उत्तम पात्रको लेकर उसमें एक नागरवेलका पान रक्खे और पानके ऊपर उक्त गोलेको रखकर दूसरे पानसे उसे ढकदेवे । फिर अच्छेप्रकारसे उसके मुखको बन्द करके गजपुटमें रखकर पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय तब निकालकर पानोंसहित उसको पीसलेवे । पश्चात् उसमें कालीमिरच और इमलीका आठ आठ माशे चूर्ण डालकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसको त्रिदोषज अतिसार और संग्रहणीरोगमें यथादोषानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करना चाहिये । इसको बृहच्चिन्तामणिरस कहते हैं ॥ १३०–३४ ॥
भुवनेश्वर रस ।
सैन्धवं त्रिफलां चैव यमानीं बिल्वपेशिकाम् ।
गृहधूमं गृहीत्वा च प्रत्येकं समभागिकम् ॥ ३५ ॥