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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 281 of 1416

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Page 281

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४९

छर्दिं ज्वरमतीसारं मूर्च्छां तृष्णां च दुर्जयाम् ।
नाशयत्यचिराद्धन्ति स्रुतिं वाऽनेकहेतुकाम् ॥ ३ ॥
जामुन और आमके कोमल पत्ते, खस, बडके, अंकुर और वडकी डाढी इन सबका स्वरस, क्वाथ अथवा चूर्ण मधुके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वमन, ज्वर, अतीसार, मूर्च्छा और दुस्तर तृषा दूर होती है। यह योग अनेक कारणोंसे उत्पन्न-हुए रक्तस्रावको शीघ्र नष्ट करता है ॥ १०२ ॥ १०३ ॥

वत्सकादि ।

सवत्सकः सातिविषः सबिल्वः सोदीच्यमुस्तश्च कृतः कषायः ।
सामे सशूले सहशोणिते च चिरप्रवृत्तेऽपि हितोऽतिसारे ॥ ४ ॥
इन्द्रजौ, अतीस, बेलगिरी, सुगन्धवाला और नागरमोथा इनका क्वाथ आम और शूलयुक्त पुराने रक्तातिसारमें विशेष हितकारी ह ॥ १०४ ॥

नाभिप्रलेप ।

कृत्वाऽऽलवालं सुदृढं पिष्टरामलकैर्भिषक् ।
आर्द्रकस्य रसेनाथ पूरयेन्नाभिमण्डलम् ॥
नदीवेगोपमं घोरमतीसारं विनाशयेत् ॥ ५ ॥
वैद्य, आमलोंको पीसकर उनके द्वारा रोगीकी नाभिके चारों ओर गोलगोल थाँवलासा बनाकर उसमें अदरखके रसको भरदेवे। इससे नदीके वेगके समान भयंकर अतीसार शीघ्र दूर होता है ॥ १०५ ॥

तथा जातीफलं पिष्ट्वा नाभौ दद्यात् प्रलेपनम् ।
दुर्निवारमतीसारं वारयत्यनिवारितम् ॥ ६ ॥
जायफलको पीसकर नाभिपर प्रलेप करनेसे असाध्य अथवा कष्टसाध्य अतिसार भी दूर होता है ॥ १०६ ॥

आम्रस्य वल्कलं पिष्टं काञ्जिकेन प्रयत्नतः ।
नाभिं संलेपयेत्तेन कल्केन मतिमान् भिषक् ॥
नदीवेगोपमं घोरमतीसारं निवारयेत् ॥ ७ ॥
आमकी छालको काँजीम पीसकर नाभिके चारों ओर प्रलेप करनेसे नदीके समान वेगवाला अतीसार भी नष्ट होता है ॥ १०७ ॥

प्रवाहिका-चिकित्सा ।

बालं बिल्वं गुडं तैलं पिप्पली विश्वभेषजम् ।
लिह्याद्वाते प्रतिहते सशूले सप्रवाहिके ॥ ८ ॥