भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३६
त्र्यूषणादिचूर्ण ।
त्र्यूषणातिविषाहिङ्गुबलासौवर्चलाभयाः ।
पीत्वोष्णेनाम्भसा हन्यादामातीसारमुद्धतम् ॥ २९ ॥
अथवा पिप्पलीमूलं पिप्पलीद्वयचित्रकात् ।
सौवर्चलवचाव्योषहिङ्गुप्रतिविषाभयाः ॥
पिबेच्छ्लेष्मातिसारार्त्तश्चूर्णिताश्चोष्णवारिणा ॥ ३० ॥
सोंठ, पीपल, मिरच, अतीस, हींग, खिरेंटी, कालानमक और हरड इन सबके समान भाग मिश्रित चूर्णको गरमजलके साथ पान करनेसे प्रबल आमातिसाररोग नष्ट होता है अथवा पीपलामूल, पीपल, गजपीपल और चीता एवं कालानमक, बच, त्रिकुटा, हींग, अतीस और हरड इनको समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर उष्णजलके साथ पान करनेसे कफातिसार दूर होता है ॥ २९ ॥ ३० ॥
शुण्ठ्यादिचूर्ण ।
शुण्ठीप्रतिविपाहिङ्गुमुस्ताकुटजचित्रकैः ।
चूर्णंमुष्णाम्बुना पीतमामातीसारनाशनम् ॥ ३१ ॥
सोंठ, अतीस, हींग, नागरमोथा, इन्द्रजौ और चीता इनका चूर्ण उष्ण जलके साथ सेवन करनेसेही आमातिसार नष्ट होता है ॥ ३१ ॥
वातातीसार-चिकित्सा ।
पञ्चमूलीबलाविश्वधान्यकोत्पलबिल्वजाः ।
वातातिसारिणे देयास्तक्रेणान्यतमेन वा ॥ ३२ ॥
वातज अतिसारवाले रोगीको पञ्चमूल एवं खिरेंटी, सोंठ, धनियाँ, कुमोदिनी (नीलोफर) और बेलगिरी इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जल मिलेहुए घोलमें पकाकर देना चाहिये ॥ ३२ ॥
पूतिकादि ।
पूतिको मागधी शुण्ठी बला धान्यं हरीतकी ।
पक्त्वाऽम्बुना पिबेत् सायं वातातीसारशान्तये ॥३३॥
दुर्गंध करञ्ज, पीपल, सोंठ, खिरेंटी, धनियाँ और हरड इनका क्वाथ बनाकर सायंकालमें सेवन करनेसे वातजन्य अतीसार शान्त होताहै ॥ ३३ ॥