भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२७
शुद्ध किया हुआ पारा और गन्धक प्रत्येक एक एक ताला, शुद्ध मीठा तेलिया तीन माशे और सबकी बराबर भाग अभ्रकभस्म लेवे। इनको एकत्र कर धतूरेके पत्तोंके रसमें और सर्पाक्षीके रस अथवा क्वाथमें एक एक प्रहरतक खरल करे । फिर धायके फूल, अतीस, नागरमोथा, सोंठ, जीरा, सुगन्धवाला, अजवायन, धनियाँ, बेलगिरी, पाठ, हरड, पीपल, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, कैथ और कच्चाअनार इन प्रत्येक औषधियोंको एक एक तोला लेकर अच्छेप्रकारसे कूटकर सबको चौगुने जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें पूर्वोक्त रसको तीन दिनतक भावना देवे । फिर उसको बालुकायन्त्रमें उत्तमप्रकारसे बन्दकरके मन्दमन्द अग्निसे दो घडीतक पकावे । जब पककर स्वयं शीतल होजाय तब ओषधिको निकालकर चूर्ण कर लेवे । यह रस मतसंजीवन नामसे प्रसिद्ध है ॥ ८४-८८ ॥
–अस्य गुञ्जाचतुष्टयम् ।
दातव्यमनुपानेन चासाध्यमपि साधयेत् ॥ ८९ ॥
षट्प्रकारमतीसारं साध्यासाध्यं जयेद् ध्रुवम् ।
नागरातिविषा मुस्तं देवदारु कणा वचा ॥ ९० ॥
यमानी वालकं धान्यं कुटजत्वक् हरीतकी ।
धातकीन्द्रयवौ बिल्वं पाठा मोचरसं समम् ।
चूर्णितं मधुना लेह्यमनुपानं सुखावहम् ॥ ९१ ॥
इस रसकी चारचार रत्ती प्रमाण मात्राको यथादोषानुसार अनुपानके साथ देनेसे साध्य हों अथवा असाध्य छहों प्रकारके अतिसार निश्चय नष्ट होते हैं । इस रसको सेवन करनेसे पश्चात् सोंठ, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पीपल, वच, अजवायन, सुगन्धवाला, धनियाँ, कुडेकी छाल, हरड, धायके फूल, इन्द्रजौ, बेलगिरी, पाठ और मोचरस इन सब औषधियोंके चूर्णको समान भाग लेकर शहदमें मिलाकर चाटे तो बडा अच्छा अनुपान होता है । इस चूर्णको शहदके साथ चाटनेसे भी अतिसार रोग दूर होता है ॥ ८९–९१ ॥
प्राणेश्वररस ।
रसान्धकमभ्रं च टङ्कणं शतपुष्पकम् ।
यमानी जीरकाख्यं च प्रत्येकं कर्षयुग्मकम् ॥ ९२ ॥