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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 257 of 1416

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Page 257

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२५

अमृतार्णवरस।

हिङ्गुलोत्थो रसो लोहं टङ्कणं गन्धकं शठी ।
धान्यकं बालकं मुस्तं पाठा जीरं घुणप्रिया ॥ ७४ ॥
प्रत्येकं तोलकं चूर्णं छागीदुग्धेन पेषयेत् ।
माषैका वटिका कार्य्या रसोऽयममृतार्णवः ॥ ७५ ॥
वटिकां भक्षयेत्प्रातर्गहनानन्दभाषिताम् ।
धान्यजीरकयूषेण विजयाशणबीजतः ॥ ७६ ॥
मधुना छागदुग्धेन मण्डेन शीतवारिणा ।
कदलीमोचकरसैः कञ्चटद्रवकेण च ॥ ७७ ॥

सिंगरफसे निकालाहुआ पारा, लोहा, सुहागा, शुद्धगन्धक, कचूर, धनियाँ, सुगन्धवाला, नागरमोथा, पाठ, जीरा और अतीस इन प्रत्येकके चूर्णको एक एक तोला लेवे। फिर सबको एकत्र बकरीके दूधमें खरल करके एकएक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एकएक गोली नित्यप्रति प्रातःकाल भक्षण करे और ऊपरसे धनियाँ, जीरा और मूँगका यूष, भाँगका चूर्ण, सनके बीजोंका चूर्ण, शहद, बकरीका दूध, भातका माँड, शीतलजल, केलेकी जडका रस, मोचरस और जलचौलाईका रस इनमेंसे किसी एकका अनुपान करे ॥ ७४–७७ ॥

अतीसारं जयेदुग्रमेकजं द्वन्द्वजं तथा ।
दोषत्रयसमुद्भूतमुपसर्गसमन्वितम् ॥ ७८ ॥
शूलघ्नो वह्निजननो ग्रहणीर्शोविकारनुत् ।
अम्लपित्तप्रशमनः कासघ्नो गुल्मनाशनः ॥ ७९ ॥

इस रसको सेवन करनेसे अतिप्रबल अतीसार, एकदोषज द्विदोषज अथवा त्रिदोषज विकार, शूल, संग्रहणी, बवासीर, अम्लपित्त, खाँसी और गुल्मप्रभृति दुस्तर व्याधियाँ शमन होती हैं और अग्नि अत्यन्त दीपन होती है ॥ ७८।७९ ॥

कारुण्यसागररस ।

भस्म सूताद् द्विधा गन्धं तथा द्वित्वं मृताभ्रकम् ।
दिनं सार्षपतैलेन पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् ॥ ८० ॥
रसैर्मार्कवमूलोत्थैः पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् ।
त्रिक्षारपञ्चलवणविषव्योषाग्निजीरकैः ॥
सविडङ्गैस्तुल्यभागैरयं कारुण्यसागरः ॥ ८१ ।

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