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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 235 of 1416

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Page 235

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २०३


बुद्धिमान् वैद्य अत्यन्त बढ़ेहुए वात, पित्त और कफादिदोषोंसे युक्त ज्वररोगीको वमन और विरेचनके योग्य अवस्था होजानेपर चरकके कल्पस्थानमें वमन और विरेचन औषधियोंकी जो विधि कही है तदनुसार रोगीको वमन और विरेचन देकर शुद्ध करे । किन्तु दोषोंकी अल्पावस्थामें वमन और विरेचन नहीं देवे ॥ ५८ ॥

ज्वरमें वमन ।

मदनं पिप्पलीभिर्वा कलिङ्गमधुकेन वा ।
युक्तमुष्णाम्बुना पेयं वमनं ज्वरशान्तये ॥ ५९ ॥

कफप्रधान ज्वरमें पीपल और मैनफलके चूर्णको, दाहयुक्त ज्वरमें इन्द्रजौके चूर्णके साथ मैनफलके चूर्णको और पित्तज्वरमें मुलहठीके चूर्णके साथ मैनफलके चूर्णको गरम जलके साथ ज्वरकी शान्तिके लिये वमन करानी चाहीये ॥ ५९ ॥

ज्वरमें विरेचन ।

आरग्वधं वा पयसा मृद्वीकानां रसेन वा ।
त्रिवृतां त्रायमाणां वा पयसा ज्वरितः पिबेत् ॥ ६० ॥

अमलतासके गूदेको दूधके साथ अथवा दाखोंके क्वाथके साथ अथवा निसोतके चूर्ण या त्रायमाणके चूर्णको दूधके साथ पान कराकर ज्वररोगीको विरेचन करावे ॥ ६० ॥

ज्वरसे क्षीणहुए मनुष्यको वमन विरेचनकी विधि ।

ज्वरक्षीणस्य न हितं वमनं न विरेचनम् ।
कामं तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ॥ ६१ ॥
प्रयोजयेज्ज्वरहरान् निरूहान् सानुवासनान् ।
पक्वाशयगते दोषे वक्ष्यन्ते येन सिद्धिषु ॥ ६२ ॥

ज्वरसे क्षीण हुए मनुष्यको वमन और विरेचन नहीं कराने चाहिये । यदि दस्त करानेकी विशेष आवश्यकता हो तो रोगीको गरम दूध अधिक परिमाणमें पान कराकर अथवा निरूहणवस्ति देकर दस्त करावे । पक्वाशयमें दोषोंके प्राप्त होनेपर चरकके सिद्धिस्थानमें कहीहुई ज्वरनाशक निरूहणवस्ति अथवा अनुवासनवस्तिके द्वारा दोषोंको शमन करे ॥ ६१ ॥ ६२ ॥

ज्वरमें शिरोविरेचन ।

गौरवे शिरसः शूले विबद्धेष्विन्द्रियेषु च ।
जीर्णज्वरे रुचिकरं दद्याच्छीर्षविरेचनम् ॥ ६३ ॥