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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 225 of 1416

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Page 225

प्रकरण.५ ] भाषाटीकासहिता । १९३


अंगारकतैल ।

मूर्वा लाक्षा हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठा सेन्द्रवारुणी ।
बृहती सैन्धवं कुष्ठं रास्ना मांसी शतावरी ॥ ३ ॥
आरनालाढकेनैव तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
तैलमङ्गारकं नाम सर्वज्वरविनाशनम् ॥ ४ ॥

मूर्वा, लाख, हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ, इन्द्रायन, बड़ी कटेरी, सैंधानमक, कूठ, रायसन, बालछड़ और शतावर इनके समान भाग मिश्रित ६४ तोले कल्क और एक आढक कांजीके साथ एक प्रस्थ तैलको पकावे। यह अङ्गारकनामक तैल सब प्रकारके ज्वरोंको दूर करता है ॥ ३ ॥ ४ ॥


बृहदङ्गारकतैल ।

शुष्कमूलादिकस्याङ्गैरङ्गैरङ्गारकस्य च ।
पक्वं तैलं ज्वरहरं शोथपाण्ड्वामयापहम् ॥
बृहदङ्गारकं तैलं जलमत्र चतुर्गुणम् ॥ ५ ॥

शुष्क मूलादि गण (सूखीमूली, पुनर्नवा, देवदारु, रायसन, सोंठ) और पूर्वोक्त अंगारक तेलकी औषधियोंका समान कल्क १ प्रस्थ, तिलका तेल २ प्रस्थ और पाकके लिये जल ८ प्रस्थ इन सबको मिलाकर उत्तम विधिसे तेलको पकावे। यह बृहदंगारक तैल-ज्वर, सूजन, पाण्डु आदि रोगोंको दूर करता है ॥ ५


लाक्षादितैल ।

लाक्षाहरिद्रामंजिष्ठाकल्कैस्तैलं विपाचितम् ।
षड्गुणेनारनालेन दाहशीतज्वरापहम् ॥ ६ ॥

लाख, हल्दी और मंजीठ इन तीनोंका कल्क १ प्रस्थ, काँजी १२ प्रस्थ, तिलका तेल २ प्रस्थ इन सबको मिलाकर उत्तम विधिसे तेलको पकावे। इस तेलकी मालिश करनेसे दाह और शीतयुक्त ज्वर नष्ट होता है ॥ ६ ॥


महालाक्षादितैल ।

लाक्षारसाढके प्रस्थं तैलस्य विपचेद् भिषक् ।
मस्त्वाढकसमायुक्तं पिष्ट्वा चात्र समावपेत् ॥ ७ ॥
शतपुष्पां हरिद्रां च मूर्वां कुष्ठं हरेणुकम् ।
कटुकां मधुकं रास्नामश्वगन्धां च दारु च ॥ ८ ॥

१३ ब.व.२*