भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १८१
समान भाग और लोहभस्म सबके बराबर भाग लेकर एकत्र करके जलके द्वारा उत्तमप्रकारसे खरलकरके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इस लोहको शहदके साथ खानेसे सब प्रकारक विषमज्वर और अन्य नानाप्रकारके ज्वर दूर होते हैं ॥ ६४ ॥
विषमज्वरान्तकलोह ।
पारदं गन्धकं तुल्यं सूताद्धं जीर्णताम्रकम् ।
ताम्रतुल्यं माक्षिकं च लौहं सर्वसमं नयेत् ॥ ६५ ॥
जयन्त्याः स्वरसेनैव कोकिलाक्षरसेन च ।
वासकार्द्रपर्णरसैः पंचधा च विमर्दयेत् ॥ ६६ ॥
पृथक् कलायमानां तु वटिकां कारयेद्भिषक् ।
विषमज्वरान्तनामाऽयं विषमज्वरनाशनः ॥ ६७ ॥
वह्निदीप्तिकरो हृद्यः प्लीहगुल्मविनाशनः ।
चक्षुष्यो बृंहणो वृष्यः श्रेष्ठः सर्वरुजापहः ॥ ६८ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समानभाग लेकर एकत्र खरल करके कजली बनाले। फिर उसमें ताम्रभस्म १ तोला, सोनामाखीकी भस्म १ तोला और लोहभस्म सबके बराबर भाग लेवे। इन सबको एकत्र खरल करके अरणी, तालमखाना, अडूसा, अदरख और पान इन पाँचोंके रसमें पृथक् पृथक् पाँच बार खरल करके मटरकी समान गोलियाँ बनालेवे। यह विषमज्वरान्तकलोह सर्वप्रकारके विषमज्वर, प्लीहा, गुल्म आदिरोगोंको नष्ट करता है एवं अग्निको दीपन करनेवाला हृदयके और नेत्रोंके लिये हितकारी, कामोत्तेजक एवं वीर्यवर्द्धक है और समस्त व्याधियोंकी उत्तम औषध है ॥ ६५-६८ ॥
बृहद्विषमज्वरान्तकलोह ।
शुद्धसूतं तथा गन्धं कारयेत्कज्जलीं शुभाम् ।
मृतसूतं हेम तारं लौहमभ्रं च ताम्रकम् ॥ ६९ ॥
तालसत्त्वं वङ्गभस्म मौक्तिकं सप्रवालकम् ।
सुवर्णमाक्षिकं चापि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ७० ॥
निर्गुण्डी नागवल्ली च काकमाची सपर्पटी ।
त्रिफला कारवेल्लं च दशमूली पुनर्नवा ॥ ७१ ॥