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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 200 of 1416

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Page 200

१६८ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-

कासं श्वासं महाघोरं विषमाख्यं ज्वरं वमिम् ।
धातुस्थं प्रबलं दाहं ज्वरदोषं चिरोद्भवम् ॥
यकृद्गुल्मोदरप्लीहश्वयथुं च विनाशयेत् ॥ ८३ ॥

पारा, गन्धक, सैंधानमक, मीठातेलिया और ताम्रभस्म ये सब समभाग और सबके बराबर लोहभस्म और लोहेके बराबर अभ्रकभस्म लेवे। पश्चात् समस्त ओषधियोंको लोहेके खरलमें डालकर लोहेकी मुसलीसे निर्गुण्डीके रसके साथ अच्छेप्रकारसे खरल करे। फिर उसमें पारेके बराबर मिरचोंका चूर्ण मिलाकर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। उनमेंसे एकएक गोली पानमें रखकर देनी चाहिये। यह रस खाँसी, श्वास, घोर विषमज्वर, वमन, धातुगतज्वर, प्रबलदाह और ज्वरदोषके कारण चिरकालसे उत्पन्नहुए यकृतविकार, गुल्मरोग, उदररोग, प्लीहा, शोथ आदि रोगोंको नष्ट करता है ॥ ८१-८३ ॥

ज्वरान्तकरस ।

भास्करो गन्धकः सर्वो देवी विहगतीक्ष्णकम् ।
शोणितं गगनं चैव पुष्पकं च महेश्वरम् ॥ ८४ ॥
भूनिम्बादिगणैर्भाव्यं मधुना गुटिका दृढा ।
चातुर्थिकं तृतीयं च ज्वरं सन्ततकं तथा ।
आमज्वरं भूतकृतं सर्वज्वरमपोहति ॥ ८५ ॥

ताम्रभस्म, गन्धक, पारा, गोपीचन्दन, सोनामाखी, लोहा, सिंगरफ, अभ्रक, रसौंत और सुवर्ण इन सबको समानभाग लेकर एकत्र खरल करके भूनिम्बादिगणकी १८ ओषधियोंको (समानभाग लेकर उनके अष्टावशेष क्वाथमें उक्त औषधिको तीनदिनतक खरलकर सुखायके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर एक एक गोली) मधुके साथ सेवन करे। यह रस चौथिया, तिजारीज्वर, सन्ततज्वर, आमयुक्तज्वर और भूतबाधाजनितज्वर आदि सम्पूर्ण ज्वरोंको शीघ्र दूर करता है ॥ ८४ ॥ ८५ ॥

वातपित्तान्तकरस ।

मृतसूताभ्रमुस्तार्कतीक्ष्णमाक्षिकतालकम् ।
गन्धकं मर्दयेत्तुल्यं यष्टिद्राक्षामृतारसैः ॥ ८६ ॥


* भूनिम्बाद्यष्टादशद्रव्याणि सर्वद्रव्यतुल्यानि, अष्टांशावशिष्टं क्वाथं कृत्वा तेन दिनत्रयं विभाव्य विशोष्य मधुना विमर्द्य अनुरूपं विदधेत् ।