भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१५८ भेषज्यरत्नावली । [ रस-
प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र आदि सम्पूर्ण व्याधियोंको इस प्रकार शीघ्र नष्ट कर देता है जैसे सुदर्शनचक्र असुरोंको तत्काल नाश कर देता है। इसको श्रीशिवजी-महाराजने वर्णन किया है ॥ १४-१९ ॥
बृहच्चूडामणिरस ।
कस्तूरिकाविद्रुमरौप्यलौहं तालं हिरण्यं रससिन्दुरं च ।
सुवर्णसिन्दूरलवङ्गमौक्तिकं चोचं घनं माक्षिकराजपट्टम् ॥४२०॥
गोक्षूरजातीफलजातिकोषं मरीचकपूर्रशिखिग्रिवं च ।
प्रगृह्य सर्वं हि समं प्रयत्नादथाश्वगन्धां द्विगुणं हि वैद्यः ॥२१॥
वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं मुनिसंख्यया ।
निर्गुण्डी फञ्जिका वासा रविमूलत्रिकण्टकैः ॥ २२ ॥
कस्तूरी, मूँगा, चाँदी, लोहा, हरताल, सुवर्ण इनकी भस्म, रससिन्दूर, स्वर्णसिन्दूर, लौंग, मोतीकी भस्म, दारचीनी, नागरमोथा, स्वर्णमाक्षिक, कान्त-लोहकी भस्म, गोखुरू, जायफल, जावित्री, मिरच, कपूर और तूतिया इन सब औषधियोंको समान भाग अर्थात् एकएक भाग और असगन्धको दो भाग लेकर वैद्य प्रथम सबको एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्ण करले, फिर उसको सिम्हालू, भारंगी, अडूसा, आककी जड़ और गोखुरू इन ओषधियोंके रसमें क्रमसे सात सात बार भावना देकर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ४२०-२२ ॥
तद्वीर्यं कथयिष्यामि वातिकं पैत्तिकं ज्वरम् ।
कफोद्भवं द्विदोषोत्थं त्रिदोषजनितं तथा ॥ २३ ॥
सन्ततं सततं हन्ति तृतीयकचतुर्थकौ ।
ऐकाहिकं द्व्याहिकं च विषमं भूतसम्भवम् ॥ २४ ॥
नाशयेदचिरादेव वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ।
चूडामणिरसोऽप्येष शिवेन परिभाषितः ॥ २५ ॥
ये गोलियाँ सेवन करनेसे वात, पित्त और कफ इन भिन्न भिन्न दोषोंसे होनेवाले ज्वर, द्विदोषज और सन्निपातजज्वर एवं सन्तत, सतत, तिजारी, चौथिया, एकतरा और दो दिन आनेवाला, विषमज्वर और भूतज्वर इत्यादि सम्पूर्ण ज्वरोंको अल्पकालमें ही इस प्रकार नष्ट कर देती हैं, जैसे वज्र वृक्षोंको । इस चूडामणि रसको शिवजीने निर्दिष्ट किया है ॥ २३-२५ ॥