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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 187 of 1416

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Page 187

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६५

चौथे दिन चनेकी बराबर गोलियाँ बनाकर सुखालेवे। इसकी एक एक गोली पीपलके चूर्ण और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे विषमज्वर नष्ट होता है ॥९७–९९॥

सर्वज्वरांकुश ।

शुद्धसूतं तथा गन्धं मरिचं नागरं कणा ।
त्वचं जैपालकं कुष्ठं भूनिम्बं मुस्तकं पृथक् ॥ ४०० ॥
चूर्णयित्वा समांशं तु कज्जल्या सह मेलयेत् ।
निर्गुण्ड्याः स्वरसे चापि आर्द्रकस्य रसे तथा ॥ ४०१ ॥
भावनां कारयित्वा तु वटिकां कारयेद्भिषक् ।
वटिकां भक्षयित्वा तु वस्त्रवेष्टं च कारयेत् ॥ ४०२ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धकको समान भाग लेकर कज्जली करलेवे। फिर मिरच, सोंठ, पीपल, दारचीनी, जमालगोटा, कूठ, चिरायता और नागरमोथा इन सबको समान भाग और कज्जलीसे आधा परिमाण लेकर बारीक चूर्ण करके कज्जलीमें मिलालेवे। पश्चात् निर्गुण्डीके पत्तोंके स्वरसमें और अदरखके रसमें अलग २ भावना देकर एक-एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। उनमेंसे एक गोली सेवन कराकर रोगीको गरम वस्त्रोंसे अच्छीतरह ढकदेवे ॥ ४००–४०२ ॥

सर्वज्वराङ्कुशवटी सर्वज्वरविनाशिनी ।
पृथग्दोषांश्च विविधान् समस्तान्विषमज्वरान् ॥ ४०३ ॥
प्राकृतं वैकृतं चापि वातश्लेष्मकृतं च यत् ।
अन्तर्गतं बहिःस्थं च निरामं साममेव वा ।
ज्वरमष्टविधं हन्ति वृक्षमन्द्राशनिर्यथा ॥ ४०४ ॥

यह सर्वज्वरांकुशवटी सर्वप्रकारके ज्वरोंको नष्ट करनेवाली है। तथा भिन्नभिन्न दोषोंसे उत्पन्न होनेवाले ज्वर, सब प्रकारके विषमज्वर, स्वाभाविकज्वर, विकृतज्वर, वातकफजनितज्वर, आन्तरिकज्वर, बाह्यज्वर, आमरहित अथवा आमयुक्त ज्वर, इनके अतिरिक्त अन्य आठोंप्रकारके ज्वरोंको यह वटी इस प्रकार शीघ्र नष्ट करदेती है जैसे वज्र (बिजली) वृक्षोंको नष्ट करदेता है ॥ ४०३ ॥ ४०४ ॥

बृहज्ज्वरांकुश रस।

पारदं गन्धकं ताम्रं हिङ्गुलं तालमेव च ।
लौहं वङ्गं माक्षिकं च खर्परं च मनःशिला ॥ ५ ॥