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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 179 of 1416

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Page 179

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १४७

विद्याधररस।

रसो गन्धस्ताम्रं त्रिकटु कटुका टङ्गणवरा
त्रिवृद्दन्ती हेमद्युतिमणिविषैस्तत्सममिदम् ।
समस्तैस्तुल्यं स्याद्विमलजयपालोद्भव रज-
स्ततः स्नुक्क्षीरेण प्रगुणमृदितं दन्तिसलिलैः ॥ ५६ ॥
द्विगुञ्जाऽस्य प्रौढं जयति वटिका सामसकलं
ज्वरं पाण्डुं गुल्मं ग्रहणिगुदकीलोद्भवगुजः ।
मरुच्छूलाजीर्णे प्रबलमपि साम्यं कृमिगदं
विबन्धं प्लीहानं यकृतमपि विद्याधररसः ॥ ५७ ॥

पारा, गन्धक, ताम्रभस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, कुटकी, सुहागा, हरड, बहेडा, आमला, निसोत, दन्तीकी जड़, धतूरेके बीज, आककी जड़ और शुद्ध वत्सनाभ ये सब ओषधियाँ समानभाग और सबकी बराबर शुद्ध जमालगोटोंका चूर्ण लेकर एकत्र पीसले फिर थूहरके दूधमें और दन्तीकी जडके काढेमें क्रमसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको सेवन करनेसे आमयुक्त-ज्वर, पाण्डु और गुल्मरोग, संग्रहणी, अर्शकी पीड़, वातशूल, अजीर्ण, कृमिरोग, मलबद्धता, प्लीहा और यकृतविकार ये सब रोग दूर होते हैं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥

पञ्चाननरस।

शम्भोः कण्ठविभूषणं समरिचं दैत्येन्द्ररक्तं रविः
पक्षौ सागरलोचनं शशियुगं भागोऽर्कसंख्यान्वितः ।
खल्ले तत्परिमर्दितं रविजलैर्गुञ्जैकमात्रं ददेत्
सिद्धोऽयं ज्वरदन्तिदर्पदलनः पञ्चाननाख्यो रसः ॥ ५८
पथ्यं च देयं दधिभक्तकं च सिन्धूत्थपथ्या मधुना समेतम् ।
गन्धानुलेपो हिमतोयपानं दुग्धं च देयं शुभदाडिमं च ॥५९॥

शुद्ध विष २ तोले, मिरच ४ तोले, गन्धक ३ तोले, सिंगरफ १ तोला और ताम्रभस्म २ तोले इन सब औषधियोंको इस प्रकार लेकर आककी जड़के रसमें उत्तमप्रकारसे खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस प्रकार यह पंचानन नामकरस सिद्ध होता है । यह ज्वररूप हाथीके दर्पको दमन करने-वाला है । इस रसकी एकएक गोली सैन्धानमक, हरडके चूर्ण और शहदमें