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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 165 of 1416

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Page 165

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १३३

पथ्य देवे; किन्तु दही और कालीमेरचोंका चूर्ण मिलाकर भातका भोजन कराना चाहिये । इसपर थोडासा अदरखका शाक सेवन कराना चाहिये । उक्त स्नान, पथ्य आदिकी क्रियाओंको आठ दिनपर्यन्त करना चाहिये ॥ २७० ॥ ७१ ॥

वडवानल ।

कान्तं च सूतं हरितालगन्धं समुद्रफेनं लवणानि पञ्च ।
नीलाञ्जनं तुत्थकमेव रूप्यं भस्म प्रवालानि वराटिकाश्च ७२ ॥
वैक्रान्तशम्बूकसमुद्रशुक्तिः सर्वाणि चैतानि समानि कुर्यात् ।
सूतं भवेद्द्वादशभागकं च स्नुह्यर्कदुग्धेन विमर्दयेच्च ॥ ७३ ॥
दिनत्रयं वह्निरसैस्ततश्च निवेशयेत्ताम्रजसम्पुटे तत् ।
मृदा च संलिप्य रसं पुटेत्तद्रसस्ततः स्याद्वडवानलाख्यः ॥
तत्पादभागेन विषं नियोज्य कृशानुतोयेन पचेत् पुनस्तत् ७४
वातप्रधाने च कफप्रधाने नियोजयेत् त्र्यूषणचित्रयुक्तम् ॥
दोषत्रयोत्थेऽपि च सन्निपाते वाताधिकत्वादिह सूतकोक्तः ॥७५

कान्तलोह, पारा, हरताल, गन्धक, समुद्रफेन, पाँचों नमक, कालासुरमा, नील। थोथा, रौप्यभस्म प्रवालभस्म, कौडीकी भस्म, वैक्रान्तमणिकी भस्म, शंख और सीपीकी भस्म इन सबको एक एक भाग लेकर एकत्र मर्दन करके उसमें १२ भाग पारा मिलावे और थूहरके दूध तथा आकके दूधमें क्रमसे तीन तीन दिनतक खरल करे । फिर चीतेके रसमें तीन दिनतक खरल करके गालासा बनाकर उसको ताँबेकी मूषामें बन्द करके ऊपरसे उसके अच्छेप्रकार कपरोटी करके पुट देवे । स्वांगशीतल होनेपर उसमेंसे औषधिको निकाल ले, इसको वडवानल रस कहते हैं । फिर इसमें समस्त ओषधियोंको चतुर्थांश शुद्ध वत्सनाभ मिलाकर चीतेके रसके द्वारा फिर थोडी देर पकावे । बारीक चूर्ण करके इस रसको वाताधिक्य, कफाधिक्यज्वरमें अथवा त्रिदोषजनित सन्निपातज्वरमें दो दो रत्तीकी मात्रासे सोंठ मिरच पीपलके चूर्ण और चीतेके क्वाथके साथ सेवन कराना चाहिये । यह वडवानलरस वाताधिक्य सन्निपातज्वरके लिये विशेषोपयोगी कहागया है ॥ ७२-७५ ॥

बृहद्वडवानल रस ।

सूतकं गन्धकं चैव हरितालं मनःशिला ।
अभ्रकं वत्सनाभं च दारुजङ्गमजं विषम् ॥ ७६ ॥