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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 161 of 1416

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Page 161

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १२९


सन्निपातमृत्युञ्जयो ज्ञानज्योतिःप्रकाशितः ।
भृङ्गराजरसेनायं रसराजः प्रदीयते ॥ ४७ ॥
निर्वाते निर्जनस्थाने बहुवस्त्रसमावृते ।
प्रस्वेदः क्षणमात्रेण जायते चिह्नमीदृशम् ॥ ४८ ॥
मूर्च्छितः पतितो भूमौ दह्यमानः पुनः पुनः ।
एवं चिह्नं समालोक्य वदेन्नैरोज्यमातुरे ॥ ४९ ॥
पथ्यं यद् याचते रोगी तत्तद्देयं प्रयत्नतः ।
दध्योदनं शीतजलं दातव्यं तद्विचक्षणैः ॥ २५० ॥
एवं महारसः श्रेष्ठः शम्भुना प्रेरितो भुवि ।
कृपया सर्वभूतानां ज्ञानज्योतिःप्रकाशितः ॥ ५१ ॥

यह श्रीसन्निपातमृत्युञ्जय रस सम्पूर्ण व्याधियोंका नाश करनेवाला है और ज्ञानकी ज्योतिके समान प्रकाश करनेवाला है। इस रसकी एक एक गोली भाँगेके रसके साथ सेवन करावे। रोगीको वात रहित एकान्तस्थानमें बहुत गरम और मोटे कपडे उढाकर रक्खे। इससे तत्काल रोगीको पसीना आता है। जब रोगी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिरपडे और बारबार शरीरमें दाह हो तो रोगीको आरोग्य हुआ समझना चाहिये। ऐसी अवस्थामें रोगीकी जिस वस्तुकी अभिलाषा हो वही वस्तु पथ्यरूपसे सेवन करानी चाहिये। विशेषकर दही भात और शीतल जल सेवन कराना सर्वोत्तम है। ज्ञानज्योतिके समान प्रकाशित इस परमोत्कृष्ट रसको श्रीशंकर भगवान्ने सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करके पृथ्वीपर विस्तृत किया है ॥ ४७–२५१ ॥

प्रभाकर ।

रसेन गन्ध द्विगुणं कृशानुरसैर्विमर्द्याष्टदिनं सुघर्मे ।
रसाष्टभागं ह्यमृतं च दद्याद्विपाचयेद्वह्निरसेन किंचित् ॥ ५२ ॥
पित्तैश्च सम्भावित एष देयस्त्रिदोषनीहारविनाशसूर्यः ।
“ अत्र भैरवं रुधिरवर्णं ध्यायेत् ” ॥ ५३ ॥

पारा १ भाग और गन्धक २ भाग लेकर दोनोंकी कज्जली करके उसको आठ दिनतक चीतेके रसमें खरल कर करके धूपमें सुखावे। फिर उसमें पारेसे अठगुना शुद्ध वत्सनाभ डालकर थोडेसे चीतेके रसमें कुछ देरतक पकावे, पश्चात्

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