भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 152 of 1416
Read in context१२० भैषज्यरत्नावली । [ रस-
इन सबको एकत्र मधुके साथ सौबार खरल करके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे एक या दो अथवा तीन गोली सोंठके चूर्ण और मधुके साथ रोगीको सेवन कराकर नारियलके जलका अनुपान करावे। औषध सेवनके पश्चात् विरेचन होजानेपर रोगीको तक्रके साथ भातका माँड सेवन करावे। फिर सैंधानमक और जीरेका चूर्ण डालकर तक्रके साथ भातका भोजन करावे। इस प्रकार इस रसको सेवन करनेसे सन्निपातज्वर, अजीर्ण, विषमज्वर, प्लीहा, अफारा, खाँसी, श्वास, मन्दाग्नि आदि समस्त व्याधियाँ शीघ्र शमन होती हैं। इस चिन्तामणिरसको श्रीभैरवजीने निर्दिष्ट किया है ॥ ८९-१९३ ॥
रसराजेन्द्र ।
पलं शुद्धस्य सूतस्य पलं ताम्रमयोरजः ।
अभ्रं नागं पलं वङ्गं पलं गन्धकतालकम् ॥ ९४ ॥
पलं शुद्धविषं चूर्णं सर्वमेकत्र कारयेत् ।
मर्दयेत काकमाच्याश्च तत्र साररसेन च ॥ ९५ ॥
मात्स्यवाराहमायूरच्छागमाहिषपित्तकैः ।
मर्दयेद्दिनमित्रैश्च त्रिकटोरम्बुभिस्तथा ॥ ९६ ॥
आर्द्रकस्वरसैः पश्चात् शतवारान्मुहुर्मुहुः ।
सिद्धोऽयं रसराजेन्द्रो धन्वन्तरिप्रकाशितः ॥ ९७ ॥
गुञ्जामात्रां रसं दद्यात् सुरसारससंयुतम् ।
मेघधाराप्रवाहेण धारितं वारि मस्तके ॥ ९८ ॥
अनिवार्यो यदा दाहस्तदा देया च शर्करा ।
भोजन दधिसंयुक्तं वास्तूकं तु दापयेत् ॥ ९९ ॥
ईश्वरेण हतः कामः केशवेन च दानवाः ।
पावकेन हतं शीतं सन्निपातं रसस्तथा ॥ २०० ॥
शुद्ध पारा एक पल, ताम्रभस्म, लोहभस्म, अभ्रक, सीसा, वङ्ग, हरताल, शुद्धगन्धक और शुद्ध वत्सनाभ ये प्रत्येक ओषधि एकएक पल लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली करले, फिर सबको कज्जलीसहित एकत्र खरल करके मकौयके स्वरसमें घोटे, पश्चात् रोहू मछली, सूकर, मोर, बकरा और भैंसा इन पाँचोंके पित्तमें पृथक् पृथक् क्रमसे मर्दन करके त्रिकुटेके क्वाथमें खरल करे। फिर अदरखके स्वरसमें सौबार घोटे तो यह रस सिद्ध होता है। इसको