Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 150 of 1416

Read in context
Page 150

११८ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-..


शरावप्रमितं वारि पातव्यं च पुनः पुनः ।
सन्निपातज्वरं चैव दाहं चैव सुदारुणम् ॥ ८४ ॥
कासं श्वासं च हिक्कां च विड्ग्रहं चाश्मरीं जयेत् ।
मूत्ररोगविबन्धे तु दातव्यं क्षीरसंयुक्तम् ॥ ८५ ॥
पञ्चतृणकृतं क्वाथं दातव्यं च पुनः पुनः ।
पानीयवटिका ह्येषा लोकनाथेन निर्मिता ॥
लोकानामुपकाराय सर्वसिद्धिप्रदायिनी ॥ ८६ ॥

जो रोगी घोर सन्निपातज्वरमें बेहोश पडा हो, जिसको वैद्यों ने असाध्य जानकर त्याग दिया हो, जिसको लंघन वालुकास्वेद आदि उपचारोंके द्वारा भी कुछ लाभ न हुआ हो और जो अत्यन्त दीन दशामें हो ऐसे रोगीको प्रथम करुणानिधान शंकर भगवान्का पूजन और सूर्यदेवको प्रणाम करके फिर इस रसकी दो या तीन गोलियाँ सकोरेमें पानीके साथ घिसकर सेवन करावे । यदि रोगकी अधिक प्रबलता प्रतीत हो तो २० गोलीतक इसी विधिसे सेवन करानी चाहिये और रोगीको औषध सेवन कराकर तत्काल गरम व मोटे वस्त्रसे ढकदेना चाहिये । जब औषधि रोगीके शरीरमें व्याप्त होजाय तब उसको थोडी २ देर पीछे एक एक सकोरा शीतलजल पान करावे । यह रस इस प्रकार सेवन करनेपर घोर सन्निपातज्वर, अत्यन्त प्रबलदाह खाँसी, श्वास, हिचकी, मलका, अवरोध और अश्मरी (पथरी) इन सब रोगोंको नष्ट करता है । मूत्रकृच्छ्ररोगमें इस रसको दूधके साथ सेवन कराकर पञ्चतृणमूल (कुश, काँस, रामसर, कालीईख और शालिधान इन औषधियों) का क्वाथ बारम्बार पान कराना चाहिये । सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करानेवाली इस पानीयवटीको जगत्का उपकार करनेके निमित्त श्रीशंकरभगवान्ने निर्माण किया है ॥ १८४-१८६ ॥

चिन्तामणिरस ।

सूतं गन्धकमभ्रकं सुविमलं सूताद्धभागं विषं
तत्र्यंशं जयपालमम्लमृदितं तद्गोलकं वेष्टितम् ।
पत्रैर्मञ्जुभुजङ्गवह्निजनितैर्न्निक्षिप्य खाते पुटं
दत्त्वा कुक्कुटसंज्ञकं सह दलैः संचूर्ण्य तत्र क्षिपेत् ॥ ८७ ॥
भागार्थं जयपालबीजममृतं तत्तुल्यमेकीकृतं
गुञ्जा त्र्यूषणसिन्धुचित्रकयुता सर्वाञ्ज्वरान्नाशयेत् ।