भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context११४ भैषज्यरत्नावली । [ रस-
कृत्वा कण्टकवेध्यं तु ताम्रं कज्जललेपितम् ।
मुहूर्तमध्यतस्ताम्रं द्रुतं चूर्णत्वमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥
एकीकृत्य तु तत्सर्वं ततः प्रस्तरभाजने ।
मर्दयेत्ताम्रदण्डेन दत्त्वा चैषां निजद्रवम् ॥ ५६ ॥
पारा ४ माशे लेकर ईंटके चूर्णके साथ मिलाकर खूब घोटे, फिर उस समस्त चूर्णको निकालकर और उसमेंसे पारेको अलग करके कमरख, अदरख, काले धतूरेके पत्ते, विधारेकी जड और घीग्वार इन प्रत्येकके स्वरसमें क्रमसे मर्दन करके सुखाताजाय; पारेको शुद्ध करनेकी यह क्रिया सर्वोत्तम है। इसके पश्चात् ४ माश गन्धक लेकर प्रथम चावलोंके जलमें धोवे, फिर उसको लोहेकी करछीमें रखकर अग्निपर तपावे, जब वह पिघलकर तेलकी समान पतली हो जाय तब उसे चीतेके काढेमें छोडदेवे। इस प्रकार शुद्ध कियेहुए पारे और गन्धकको लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली करलेवे। फिर शुद्ध ताँबेके कण्टकवेधी सूक्ष्मपत्रोंपर उस कज्जलीका लेप करके उन पत्रोंको हाँडीमें बन्दकर चूल्हेपर रखकर अग्नि देवे। इस प्रकारसे मुहूर्त्त-भरमें ही ताँबेकी उत्तम भस्म हो जाती है। उक्त विधिसे तैयार की हुई ताम्रभस्म १ माशा, लोहभस्म १ माशा और स्वर्णमाक्षिकभस्म १ माशा लेकर तीनोंको पत्थरके खरलमें डालकर निम्नलिखित ओषधियोंके रसके साथ ताँबेकी मुसलीसे खरल करे ॥ १५१-१५६ ॥
प्रथमे केशराजश्च द्वितीये ग्रीष्मसुन्दरः ।
तृतीये भृङ्गराजश्च चतुर्थे भेकपर्णिका ॥ ५७ ॥
पञ्चमे च निसुन्दारःषष्ठे च रसपूर्तिका ।
सप्तमे पारिभद्रश्च अष्टमे रक्तचित्रकः ॥ ५८ ॥
शक्रासनं च नवमे दशमे काकमाचिका ।
एकादशे तथा नीला द्वादशे हस्तिशुण्डिका ॥ ५९ ॥
अमीषामोषधीनां तु प्रत्येकं तु पलद्रवम् ।
मर्दयेत्तु प्रयत्नेन द्वादशाहेन साधकः ॥ १६० ॥
पहले दिन कुकुरभाँगरेके रसमें, दूसरे दिन ग्रीष्मसुन्दर ( शालिशाक ), तीसरे दिन भाँगरा, चौथे दिन मण्डूकपर्णी, पाँचवें दिन सिंहाळ्ह, छठे दिन मालकाँगनी, सातवें दिन फरहद, आठवें दिन' लालचीता, नववें दिन भाँग, दसवें दिन मकोय, ग्यारहवें दिन नीलीवृक्ष और बारहवें दिन हाथीशुण्डी इन ओषधियोंका चार चार