भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२९१
भेषजं पूर्वमुद्दिष्टं नराणां यज्ज्वरादिषु ।
देयं तदेव बालानां मात्रा तस्य कनीयसी ॥ ४ ॥
मनुष्योंके ज्वरादिरोगोंमें पहले जो ओषधियें कही हैं वे ही ओषधियें बालकोंके ज्वरादिरोगोंमें अल्पमात्रासे देनी चाहिये ॥ ४ ॥
प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भेषजरक्तिका ।
अवलेह्या तु कर्त्तव्या मधुक्षीरसिताघृतैः ॥ ५ ॥
एकैकां वर्द्धयेत्तावद्यावत्संवत्सरो भवेत् ।
तदूर्ध्वं माषवृद्धिः स्याद्यावदाषोडशाब्दिकः ॥ ६ ॥
एक महीनेके बालकको एक रत्ती प्रमाण ओषधि शहद, दूध, मिश्री अथवा घृतके साथ मिलाकर चटानी चाहिये । दूसरे महीनेसे सालभर तकके बालकों प्रत्येक मासमें एक एक रत्ती मात्रा बढाकर देवे और सालभरकी अवस्थावाले बालकसे सोलह वर्षतककी अवस्थावाले बालकोंको प्रत्येकवर्ष एकएक माशेकी मात्रा बढाकर सोलह माशे तक औषधि देनी चाहिये ॥ ५ ॥ ६ ॥
यो बालोऽचिरजातःस्तनं न गृह्णाति तस्य सहसैव ।
धात्रीमधुघृतपथ्याकल्केनाघर्षयेज्जिह्वाम् ॥ ७ ॥
जो थोडे दिनोंका बालक माताके दूधको नहीं पीवे तो आमले और हरडके बारीक चूर्णको शहद और घीमें मिलाकर उसकी जिह्वापर घिसे । इससे दूध पीने लगता है ॥ ७ ॥
कुष्ठं वचाऽभया ब्राह्मी कनकं क्षौद्रसर्पिषा ।
वर्ण्यायुःकान्तिजननं लेहं बालस्य दापयेत् ॥ ८ ॥
कूठ, वच, हरड, ब्राह्मी और सुवर्णभस्म इनके चूर्णको समान भाग लेकर घी और शहदमें मिलाकर बालकको चटावे । इससे वर्ण, आयु और कान्तिकी वृद्धि होती है ॥ ८ ॥
स्तन्याभावे पयश्छागं गव्यं वा तद्गुणं पिबेत् ।
ह्रस्वेन पंचमूलेन स्थिरया वा सितायुतम् ॥ ९ ॥
माताके या धायके स्तनोंमें दूधका अभाव होनेपर बालकको बकरीका अथवा गौका दूध हल्का करके पिलावे । किंवा लघुपञ्चमूल या शालपर्णीका काथ दूध और मिश्रीके सहयोगसे पान कराना चाहिये ॥ ९ ॥