भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१२८६ भैषज्यरत्नावली । [ सूतिकारोग-
रसैस्ताम्बूलवल्ल्याश्च दलोत्थैर्भावितं पृथक् ॥
द्रवे किञ्चित्स्थिते चूर्ण मरिचस्य पलं क्षिपेत् ॥ ८४॥
अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म, गन्धक, पारा, मैनासिल, सुहागा, जवाखार और त्रिफला ये प्रत्येक चार चार तोले, शुद्ध मीठातेलिया ४ माशे लेकर सबकों एकत्र पीस लेवे। फिर सब चूर्णको गूमा, अडूसा और नागवल्ली इनके पत्तोंके एक पल रसमें अलग २ क्रमशः भावना देवे। जब कुछ पतला रहजाय तब उसमें १ पल मिरचोंका चूर्ण डालकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ८३-८४ ॥
सर्वातीसारशमनं सर्वशूलनिवारणम् ॥ ८५ ॥
सूतिकाशोथपाण्डुघ्नं सर्वज्वरविनाशनम् ।
नाशयेत्सूतिकातङ्कं वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ८६ ॥
इस वटीको सेवन करनेसे सर्वप्रकारका अतीसार, सब शूल, सूतिकारोग, सूजन पाण्डुरोग और सब प्रकारका ज्वर नष्ट होताहै। जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंका नाश होताहै उसी प्रकार सूतिकारोग नष्ट होताहै ॥ ८५ ॥ ८६ ॥
सूतकारिरस ।
टङ्कणं मूर्च्छितं सूतं गन्धकं हेम तारकम् ।
जातीफलं तथा कोषं लवङ्गैला च धातकी ॥ ८७ ॥
वत्सकेन्द्रयवं पाठा शृङ्गी विश्वाजमोदिका ।
गुडी प्रसारणीरसैश्चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ॥ ८८ ॥
भक्षयेत्तद्रसैः प्रातः सूतिकातङ्कशान्तये ।
जीर्णज्वरं तथा शोथं ग्रहणीप्लीहकासनुत् ॥ ८९ ॥
सुहागा, फुँकाहुआ पारा, गन्धक, सुवर्ण, रूपा, जायफल, जावित्री, लौंग, इलायची, धायके फूल, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, पाठ, काकडासिंगी, सोंठ और अजमोद इनके चूर्णको समान भाग लेकर प्रसारणीके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोलियां बनालेवे। फिर सूतिकारोगको शान्त करनेके लिये प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक वटी प्रसारणीके रसके साथ सेवन करे। इससे पुराना ज्वर, सूजन, संग्रहणी, तिल्ली और खाँसी आदि सब विकार दूर होते हैं ॥
भद्रोत्कटाद्य घृत ।
समूलपत्रशाखं तु शतं भद्रोत्कटस्य च ।
वारिद्रोणेन संसाध्य स्थाप्यं पादावशेषितम् ॥ ९० ॥