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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1315 of 1416

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Page 1315

चिकित्सा। [ भाषाटीकासहिता । १२८३

बृहत्सूतिकाविनोदरस ।

शुण्ठ्या भागो भवेदेको द्वौ भागौ मरिचस्य च ।
पिप्पल्याः स्यात्त्रिभागं च अर्द्धभागं च व्योमकम् ॥६४॥
जातीकोषस्य भागौ द्वौ द्वौ भागौ तुत्थकस्य च ।
सिन्धुवारजलेनैव मर्दयेदेकयामतः ॥
मधुना सह भोक्तव्यः सूतिकातङ्कनाशनः ॥ ६५ ॥
सोंठ १ भाग, मिरच २ भाग, पीपल ३ भाग, अभ्रक आधाभाग, जावित्री दो भाग और तूतिया दो भाग इन सबको एकत्र कर सिह्वालूके रस अथवा क्वाथसे एक प्रहरतक खरल करे। फिर इस रसको दो रत्ती प्रमाण ले शहदमें मिलाकर भक्षण करे तो प्रसूताके सर्व रोग नष्ट होते हैं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥

सूतिकारिरस ।

रसगन्धककृष्णाभ्रं तदर्द्धं ताम्रभस्मकम् ।
चूर्णितं मर्दयेद्यत्नान्मण्डूकपर्णीरसेन च ॥ ६६ ॥
छायाशुष्का गुडी कार्या कलायसदृशी ततः ।
मात्रया कटुना देया सूतिकातङ्कनाशिनी ॥
ज्वरतृणारुचिहरी शोथघ्नी वह्निदीपनी ॥ ६७ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक और काली अभ्रक ये प्रत्येक एक एक तोला और ताम्र-भस्म छः माशे लेवे । फिर सबको एकत्र कर मण्डूकपर्णीके रसद्वारा यत्नपूर्वक खरल करे और छायामें सुखाकर मटरकी बराबर सुन्दर गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोली अदरखके साथ खानेसे प्रसूतिरोग नष्ट होता है तथा ज्वर, तृषा, अरुचि और शोथ दूर होता है, अग्नि दीपन होती है ॥६६॥६७॥

सूतिकाघ्नरस ।

रसगन्धकलौहाभ्रं जातीकोषं सुवर्णकम् ।
समांशं मर्दयेत्खल्ले छागीदुग्धेन पेषयेत् ॥ ६८ ॥
गुञ्जाद्वयप्रमाणेण वटिकां कुरु यत्नतः ।
ज्वरातीसाररोगघ्नः सूतिकातङ्कनाशनः ॥
सूतिकाघ्नो रसो नाम ब्रह्मणा परिकीर्त्तितः ॥ ६९ ॥
शोधित पारा, गन्धक, लोहा, अभ्रक, जावित्री और धतूरके बीज इन सबको समान भाग लेकर बकरीके दूधके साथ उत्तम प्रकारसे खरल करे । फिर दो दो