भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२६३
पहले महीनेमें-मुलहठी, सागौनके बीज, क्षीरकाकोली और देवदारु इनको समान भाग लेकर जलमें पीसकर दूधके साथ पान करावे । एवं दूसरे महीनेमें अम्लोट, कालेतिल, मंजीठ और शतावरका, तीसरे महीनेमें-बाँदा, क्षीरकाकोली, नीलकमल और अनन्तमूल, चौथे महीनेमें-अनन्तमूल, श्यामलता, रास्ना, कमलनाल और मुलहठी, पाँचवें महीनेमें-बडीकटेरी, कटेरी, कुम्हेर, बडादिक्षीरीवृक्षोंके अंकुर और छाल तथा भसींडा, छठे महीनेमें-पिठवन, खिरेंटी, सहिंजना, गोखुरू और मुलहठी, सातवें महीनेमें- सिंघाडा, भसींडा, दाख, कसेरू, मुलहठी और मिश्री ये सात प्रयोग आधे आधे श्लोकोंमें जो समाप्त किये गये हैं इनकी प्रत्येक औषधिको समान भाग लेकर जलमें बारीक पीसकर दूधके साथ मिलालेवे । फिर इन मेंसे हरएक प्रयोग प्रत्येक मासमें क्रमानुसार उत्तम रीतिसे सात महीनेतक गर्भिणी स्त्रीको सेवन करावे ! ये प्रयोग गर्भस्रावमें अत्यन्त हितकारी हैं ॥ २९-३२ ॥
कपित्थबिल्वबृहतीपटोलेक्षुनिदिग्धिकाः ।
मूलानि क्षीरपिष्टानि दापयेद्भिषगष्टमे ॥ ३३ ॥
आठवें महीनेमें-गर्भस्राव हो तो वैद्य कैथकी जड, बेलकी जड, बडी कटेरीकी जड, परवल, ईखकी जड और कटेरीकी जड इन सबको दूधमें पीसकर गर्भिणीस्त्रीको सेवन करावे । इससे गर्भस्राव होना दूर होता है ॥ ३३ ॥
नवमे मधुकानन्तापयस्याशारिवाः पिबेत् ॥ ३४ ॥
नवमें महीनेमें-गर्भ पतित होता जान पडे तो गर्भवती स्त्री मुलहठी, अनन्तमूल, क्षीरकाकोली और उसवा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर दूधके साथ पान करे तो गर्भस्राव होना दूर होता है ॥ ३४ ॥
पयस्तु दशमे शुण्ठ्याः शृतं शीतं प्रशस्यते ।
सक्षीरा वा हिता शुण्ठी मधुकं देवदारु च ।
एवमाप्यायते गर्भस्तीव्रा रुक् च प्रशाम्यति ॥ ३५ ॥
दशवें महीनेमें-सोंठ एक तोला और दूध ८ तोले लेकर ३२ तोले जलमें पकावे । जब पकते पकते दूधमात्र शेष रहजाय तब उस दूधको शीतल कर पान करावे अथवा सोंठ, मुलहठी और देवदारु इनको समान भाग लेकर इनके द्वारा उक्त विधिसे दूधको पकाकर और शीतल करके गर्भिणीस्त्री पान करे तो गर्भस्राव होना और उसकी तीव्र पीडा शमन होती है ॥ ३५ ॥