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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1293 of 1416

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Page 1293

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२६१


सातवें महीनेमें गर्भकी पीडासे पीडित, सुखकी इच्छा करनेवाली गर्भवती स्त्री शतावर और भर्त्तौंडेको समान भाग ले दूधमें पीसकर अथवा कैथकी जड सुपारीकी जड, खीलें और चीनी इनको बराबर लेकर शीतल जलमें पीसकर दूधमें मिश्रित करके पान करे तो गर्भजन्य शूल शीघ्र नष्ट होता है ॥ १७ ॥ १८ ॥

अष्टमे तु यदा मासे गर्भे भवति वेदना ।
तदा पिष्ट्वा तु धन्याकं पाययेत्तण्डुलाम्बुना ॥
शूलं निवर्त्तते तेन गर्भः सन्धार्थ्यते स्त्रियाः ॥ १९ ॥
एवं पलाशस्य दलं सुपिष्टं संपीय तोयेन सुशीतलेन ।
अत्यन्तघोराष्टममासगर्भव्यथातुरा यान्ति सुखं तरुण्यः ॥ २०

आठवें महीनेमें गर्भिणीस्त्रीके किसी प्रकारकी पीडा हो तो उसको धनियों चावलोंके जलमें पीसकर पान कराना चाहिये । इससे पीडा दूर होती है और गर्भ स्थिर होजाता है। एवं ढाकके पत्तोंको शीतल जलमें पीसकर पीनेसे आठवें महीनेकी अत्यन्त घोर पीडासे दुःखित स्त्रियें तत्काल आनन्दित होती हैं ॥ १९ ॥ २० ॥

गर्भिण्या नवमे मासे यदा भवति वेदना ।
एरण्डमूलं काकोलीं पिष्ट्वा शीतोदकेन च ॥ २१ ॥
पीत्वा शूलाद्विमुच्येत तदा नारी न संशयः ।
तथा पलाशबीजं च सकाकोलीकुरुण्टकम् ॥
भक्तेन वारिणा पिष्ट्वा गर्भशूलं व्यपोहति ॥ २२ ॥

नववें महीनेमें जो गर्भवती स्त्रीके वेदना हो तो अण्डकी जड और काकोलीको समान भाग लेकर शीतल जलमें खरल करके पान करावे तो वह स्त्री निश्चय उक्त पीडासे मुक्त होजाती है अथवा ढाकके बीज, काकोली और पीलीकटसरैया इनको काँजीमें पीसकर पान करे तो गर्भगत शूल दूर होता है ॥ २१ ॥ २२ ॥

अथवा दशमे मासि वेदना जायते यदा ।
तथा नीलोत्पलं यष्टिमधुकं मुद्गसंयुतम् ॥ २३ ॥
ससितं चाम्भसा पिष्ट्वा क्षीरेणालोड्य पाययेत् ।
दोषं च नाशयेदेषा शूलं गर्भसमुद्भवम् ॥ २४ ॥

दशवें महीनेमें यदि गर्भिणीके अकस्मात पीडा उत्पन्न होजाय तो उसको नीलकमल, मुलहठी, मूँग और मिश्री ये औषधियाँ समान भाग लेकर शीतल जलमें