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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1278 of 1416

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Page 1278

१२४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ योनिव्यापद-

आरनालपरिपेषितं त्र्यहं या जवाकुसुममत्ति पुष्पिणी ।
सत्पुराणगुडमुष्टिसेविनी सन्दधाति न हि गर्भमङ्गना ३०॥
ऋतुमती स्त्री गुड़हलके फूलोंको काँजीमें पीसकर और पुराने गुड़में मिलाकर तीन दिनतक सेवन करे तो उसके कभी भी गर्भधारण नहीं होता ॥३०॥
पाठापत्रमृतुस्नाता पीत्वा गर्भं न धारयेत् ॥
रजस्वला स्त्री स्नान करके पाठके पत्तोंको जलमें पीसकर पान करे तो गर्भस्थिति नहीं होती ॥

धात्र्यर्जुनाभयाचूर्णं तोयपीतं रजो हरेत् ।
शेलुच्छदमिश्रपिष्टभक्षणं च तदर्थकृत् ॥ ३१ ॥
आमले, अर्जुनकी छाल, और हरड इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको जलके साथ ऋतुकालमें सेवन करनेसे अथवा लहसौडेके पत्तोंको मिलाकर उक्त औषधियोंके बडे बनाकर खानेसे आर्त्तवका होना बन्द होता है और गर्भको धारण करनेकी शक्ति नष्ट होजाती है ॥ ३१ ॥

रसाञ्जनं हेमवतीवयःस्थाचूर्णीकृतं शीतजलेन पीतम् ।
रजोविनाशं नियतं करोति शङ्का च का गर्भसमागमस्य॥
रसौत, हरड और आमले इनको एकत्र पिसकर शीतल जलके साथ पान करनेसे स्त्रियोंके नियमित समयमें होनेवाला ऋतु बन्द होजाता है। फिर गर्भोत्पत्ति होनेकी और सम्भावना क्या है ? ॥ ३२ ॥

नष्टपुष्पान्तकरस ।
रसेन्द्रगन्धकं लौहं वङ्गं सौभाग्यमेव च ।
रजतञ्चाभ्रताम्रं च प्रत्येकं च पलं पलम् ॥ ३३ ॥
गुडूची त्रिफला दन्ती शेफाली कण्टकारिका ।
दारुसैन्धवकुष्ठं च बृहती काकमाचिका ॥ ३४ ॥
नतं तालीशवेत्राग्रं श्वदंष्ट्रा वृषकं बला ।
एतेषां स्वरसैर्भाव्यं त्रिवारं च पृथक् पृथक् ॥ ३५ ॥
जीवन्तीं मधुकं दन्तीं लवङ्गं वंशलोचनम् ।
रास्नां गोक्षुरबीजं च शाणमानं विचूर्णयेत् ॥ ३६ ॥
सर्वमेकीकृतं पेष्यं जयन्तीतुलसीरसैः ।
मर्दयित्वा वटीं कुर्यान्नष्टपुष्पकयोषिते ॥ ३७ ॥