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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1267 of 1416

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Page 1267

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३५


कर्पूरं नलदं चैव जातीकोषं जलं घनम् ।
नागेश्वरं लवङ्गं च कुष्ठं सत्रिफलं तथा ॥
जलेन वटिका कार्या छायया शोषयेत्तु ताम् ॥ ४७ ॥

शुद्ध अभ्रक चार तोले, सुहागेकी खील एक तोला तथा दारचीनी, इलायची, तेजपात, कपूर, खस, जावित्री, सुगन्धवाला, नागरमोथा, नागकेशर, लौंग, कूठ और त्रिफला इन प्रत्येक औषधिको दो दो माशे लेकर सबको एकत्र जलके द्वारा खरल कर गोलियाँ बनालेवे । फिर उनको छायामें सुखाकर रख लेवे ॥ ४६ ॥ ४७ ॥

प्रदरं नाशयेत्सर्वं साङ्गमर्दं सवेदनम् ।
अशीतिं वातजान्रोगान्मन्दाग्निमतिदारुणम् ॥ ४८ ॥
सज्वरग्रहणीं चैव रक्तपित्तमरोचकम् ॥
कासान्पञ्च प्रतिश्यायं श्वासं हृद्रोगमेव च ॥ ४९ ॥

इस रसको सेवन करनेसे अङ्गोंका टूटना और वेदनायुक्त सर्वप्रकारका प्रदररोग नष्ट होता है । यह अस्सी प्रकारके वातज रोग, मन्दाग्नि, दारुण ज्वरसहित संग्रहणी, रक्तपित्त, अरुचि, पाँच प्रकारकी खाँसी, प्रतिश्याय ( जुकाम ), श्वास और हृदयरोगको नष्ट करता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥

रत्नप्रभावटिका ।

स्वर्णमौक्तिकमभ्रं च नागं वङ्गं च पित्तलम् ।
माक्षिकं रजतं वज्रं लौहं तालं च खर्परम् ॥ ॥ ५० ॥
कदल्याः काकमाच्याश्च वासकस्योत्पलस्य च ।
स्वरसेन जयन्त्याश्च कर्पूरसलिलेन च ॥ ५१ ॥
भावयित्वा यथाशास्त्रमहोरात्रमतः परम् ।
सम्मर्द्यातन्द्रितः कुर्याद्भिषग्गुञ्जामिता वटीः ॥ ५२ ॥

सुवर्ण, मोती, अभ्रक, सीसा, वङ्ग, पीतल, सोनामाखी, चाँदी, हीरा, लोहा, हरिताल और खपरिया इन सबकी भस्मोंको समान भाग लेकर केलेकी जड, मकोय, अडूसेकी छाल, कमल और जयन्तीके पत्ते इन सबोंके स्वरस तथा कपूरके जलमें यथाक्रम भावना देकर शास्त्रोक्त विधिसे एक दिनरात्रिपर्यन्त निरालस्य होकर उत्तम प्रकार खरल करे, फिर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ५०-५२ ॥