भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| १२२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ शिरोरोग- |
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भृङ्गराजस्य च रसे प्रस्थद्वयसमायुते ॥ ९२ ॥
चतुःप्रस्थमिते क्षीरे तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
कल्कैर्मधुकहीबेरमञ्जिष्ठाभद्रमुस्तकैः ॥ ९३ ॥
नखकर्पूरभृङ्गेलाजीवन्तीपद्मकुष्ठकैः ।
मार्कवासकतालीससर्जनिर्यासपत्रकैः ॥ ९४ ॥
विडङ्गशतपुष्पाश्वगन्धागन्धर्वहस्तकैः ।
शोकहन्नारिकेलाभ्यां कर्षमानैर्विपाचिते ॥
उत्तार्य वस्त्रपूतं च शुभे भाण्डे सुधूपिते ॥ ९५ ॥
घीग्वारका रस १ प्रस्थ, धतुरेके पत्तोंका रस एक प्रस्थ, भाँगरेका रस दो प्रस्थ और ४ प्रस्थ दूध इनमें १ प्रस्थ तिलका तेल एवं मुलहठी, सुगन्धवाला, मंजीठ, नागरमोथा, नखद्रव्य, कपूर, दारचीनी, छोटीइलायची, जीवन्ती, पद्माख, कूठ, भाँगरा, अडूसा, तालीशपत्र, राल, तेजपात, वायविडङ्ग, सौंफ, असगन्ध, अण्डकी जड, अशोककी छाल और नारियलकी जड इन औषधियोंको अलहिदा दो दो तोले लेकर सचको एकत्र कूट पीसकर मिलालेवे । फिर विधिपूर्वक शनैः शनैः तेलको पकावे । जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानकर धूप आदिसे सुवासित उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ९२–९५ ॥
त्रिरात्रमथ गुप्तं च धारयेद्विधिविद्भिषक् ।
ततस्तु तैलमभ्यङ्गे मूर्ध्नि क्षेपे नियोजयेत् ॥ ९६ ॥
फिर विधिको जाननेवाला वैद्य उस पात्रको तीन दिनतक मिट्टीमें गाडकर रक्खे, पश्चात् निकालकर उसकी शरीरपर और शिरपर मालिश करे ॥ ९६ ॥
शमयेदर्दिरतं गाढं मन्यास्तम्भशिरोगदान् ।
तालुनासाक्षिजातं तु शोषमूर्च्छाहलीमकम् ॥ ९७ ॥
हनुग्रहगदत्त्वं वा बाधिर्यं कर्णवेदनम् ॥ ९८ ॥
यह तेल घोरतर अर्दितरोग, मन्यास्तम्भ, शिरोरोग तथा तालु नासिका और नेत्रगतरोग, शोष, मूर्च्छा, हलीमक, हनुग्रह, बधिरता और कानकी पीडा आदि रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ९७ ॥ ९८ ॥
शिरोरोगमें पथ्य ।
स्वेदो नस्यं धूमपानं विरेको लेपश्चर्दिर्लङ्घनं शीर्ष-