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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1254 of 1416

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Page 1254

१२२२ भैषज्यरत्नावली । [शिरोरोग-

यह तेल कफसे, वातकफसे और त्रिदोषसे उत्पन्न हुए कर्णशूल शिरःशूल और दारुण नेत्रशूलको तत्काल नष्ट करता है । इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ ६५ ॥

महादशमूलतैल ।

दशमूलं पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तेन पादावशेषेण कटुतैलाढकं पचेत् ॥ ६६ ॥
जम्बीराईकधुस्तूरस्वरसं तैलतुल्यतः ।
कल्कं कणाऽमृता दार्वी शतपुष्पा पुनर्नवा ॥ ६७ ॥
शिग्रुपिप्पलिका तिक्ता करञ्जं कृष्णजीरकम् ।
सिद्धार्थकं वचा शुण्ठी पिप्पली चित्रकं शठी ॥ ६८ ॥
देवदारु बला रास्ना सूर्यावर्त्तककट्फलम् ।
निर्गुण्डी चविका गैरि ग्रन्थिकं शुष्कमूलकम् ॥ ६९ ॥
यमानी जीरकं कुष्ठमजमोदा च ताडकम् ।
एतेषां पलिकैर्भागैर्विपचेन्मतिमान् भिषक् ॥ ७० ॥
निहन्ति विविधान्व्याधीन्कफवातसमुद्भवान् ।
शिरोमध्यगताञ्च्रोगान्छोथान्हन्ति व्रणानपि ॥ ७१ ॥
“सिद्धफलमिदम्” ॥

दशमूलकी समस्त औषधियोंको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । चौथाई भाग जल शेष रहजानेपर उसको उतारकर छानलेवे । फिर उसमें कडवा तेल १ आढक, जम्बीरीनींबूका रस, अदरख और धतूरेका रस इनको भी एक एक आढक तथा कल्कके लिये पीपल, गिलोय, दारुहलदी, सौंफ, पुनर्नवा, सहिंजना, पीपल, कुटकी, करंजुआ, कालाजीरा, सफेद सरसों, वच, सोंठ, गजपीपल, चीता, कचूर, देवदारु, खिरेंटी, रास्ना, हुलहुल, कायफल, निर्गुण्डी, चव्य, गेरू, पीपलामूल, सूखीमूली, अजवायन, जीरा, कूठ, अजमोद और विधारके बीज बुद्धिमान् वैद्य इन औषधियोंके चार चार तोले कल्कको डालकर यथाविधि तेलको पकावे । प्रतिदिन नियमपूर्वक मर्दन करनेसे यह तेल कफ और वातसे उत्पन्न हुए अनेक प्रकारके रोगोंको तथा शिरःसम्बन्धी सब रोगों एवं सूजन और क्षतोंको तत्क्षण नष्ट करता है । यह तत्काल इष्ट फलको देनेवाला है । इसको पान करनेसे भयानक खाँसी दूर होती है ॥