भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२११
दूध लाल चन्दन, कपूर, सर्वप्रकारके तीखे और हल्के पदार्थ ये सब क्रियायें अन्नपान और औषधियें यथादोषानुसार सेवन करनेसे समस्त नेत्ररोगोंको नष्ट करती हैं ॥ ९८-२०२ ॥
नेत्ररोगमें अपथ्य ।
क्रोधं शुचं मैथुनमश्रुवायुविण्मूत्रनिद्रावमिवेगरोधान् ।
सूक्ष्मेक्षणं दन्तविघर्षणं च स्नानं निशाभोजनमातपं च ॥ ३॥
द्रवं रजोधूमनिषेवणं च दृक्स्वेदनं चापि विरुद्धमन्नम् ।
प्रजल्पनं छर्द्दनमम्बुपानं मधूकपुष्पं दधि पत्रशाकम् ॥ ४ ॥
कालिन्दपिण्याकविरूढकानि मत्स्यं सुरां मांसमजाङ्गलं च ।
ताम्बूलमम्लं लवणं विदाहि तीक्ष्णं कटूष्णं गुरु चान्नपानम् ।
नरो न सेवेत हिताभिलाषी रोगेषु सर्वेषु दृगाश्रयेषु ॥२०५॥
क्रोध शोक, स्त्रीप्रसङ्ग, आँसू, अपानवायु, मल, मूत्र, निद्रा, और वमन इनके वेगोंको रोकना, बहुत सूक्ष्म वस्तुको देखना, दन्तमञ्जन करना, स्नान, रात्रिमें भोजन, धूपका सेवन, पतले पदार्थ, धूल और धुएँका सेवन, नेत्रोंको स्वेद देना, विरुद्ध अन्न-पान, बहुत बोलना, वमन करना, अधिक जल पान, महुएके फूल, दही, पत्तोंवाले शाक, तरबूज, तिलकुट, जिसमें अंकुर निकल आये हों ऐसे अन्न, मछली, मदिरा, जङ्गलीजीवोंके अतिरिक्त अन्य प्राणियोंका मांस, ताम्बूल, खटाई या खट्टे पदार्थ, नमकीन, दाहकारक, तीक्ष्ण चरपरे गरम और गुरुपाकी अन्न और पानीय द्रव्य इन सबको हितकी अभिलाषा करनेवाला नेत्ररोगी सर्वप्रकारके नेत्ररोगोंमें कदापि सेवन न करे ॥ ३-२०५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां नेत्ररोगचिकित्सा ।
शिरोरोगकी चिकित्सा ।
वातिके शिरसो रोगे स्नेहस्वेदान्सनावनान् ।
पानान्नमुपनाहांश्च कुर्याद्वातामयापहान् ॥१॥
वातज शिरोरोगमें तेलादिस्नेहद्रव्योंकी मालिश, वातहर द्रव्योंके द्वारा सेक नस्य और वातनाशक अन्न पान एवं प्रलेपादि उपचार करने चाहिये ॥ १ ॥