भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहित । १२०७
नीलोत्पलं शारिवे द्वे चन्दनं रजनीद्वयम् ।
कार्षिकैः पयसा तुल्यं त्रिगुणं त्रिफलारसम् ॥
घृतप्रस्थं पचेदेतत्सर्वनेत्ररुजापहम् ॥ ७७ ॥
२-त्रिफला, त्रिकुटा, दाख, मुलहठी, कुटकी, पुण्डेरिया, छोटी इलायची, वाय-विडङ्ग, नागकेशर, नीलकमल, उसवा, अनन्तमूल, लालचन्दन, हल्दी और दारु-हल्दी, इन प्रत्येक औषधियोंका कल्क, एक एक कर्ष, दूध एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ और त्रिफलेका क्वाथ तीन प्रस्थ लेवे। सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि घृत-को सिद्ध करे। यह घृत सर्व प्रकारके नेत्ररोगोंको दूर करता है ॥ ७६ ॥ ७७ ॥
तिमिरं दोषमास्रावं कामलां काचमर्बुदम् ।
विसर्पं प्रदरं कण्डूं रक्तं श्वयथुमेव च ॥ ७८ ॥
खालित्यं पलितं चैव केशानां पतनं तथा ।
विषमजवरमर्म्माणि शुक्रं चाशु व्यपोहति ॥ ७९ ॥
अन्ये च बहवो रोगा नेत्रजा ये च वर्त्मजाः ।
तान्सर्वानाशयत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १८० ॥
न चैतस्मात्परं किञ्चिदृषिभिः कश्यपादिभिः ।
दृष्टिप्रसादनं दृष्टं यथा स्यात्त्रैफलं घृतम् ॥ ८१ ॥
इसके सेवनसे तिमिररोग, स्राव होना, कामला, काच, अर्बुद, विसर्प प्रदर, खुजली, रक्तविकार, सूजन, खालित्य, पलित, केशोंका गिरना, विषम-ज्वर, अर्म और शुक्र आदि रोग तत्काल नाश होते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य अनेकों प्रकारके नेत्र तथा वर्त्मजन्य रोगोंको यह घृत इस भाँति नष्ट करता है, जिस प्रकार सूर्य अन्धकारसमूहको तत्क्षण नष्ट करदेते हैं। कश्यपादि ऋषियोंने कहा है कि, दृष्टिको प्रसन्न करनेवाली इस त्रिफलाघृतसे बढकर अन्य औषधि नहीं है ॥ १७८-१८१ ॥
महात्रिफलाद्यघृत ।
त्रिफलाया रसप्रस्थं प्रस्थं भृङ्गरसस्य च ।
वृषस्य च रसप्रस्थं शतावर्याश्च तत्समम् ॥ ८२ ॥
अजाक्षीरं गुडूच्याश्च आमलक्या रसं तथा ।
प्रस्थं प्रस्थं समाहृत्य सर्वैरेभिर्घृतं पचेत् ॥ ८३ ॥