भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२०५
अभ्रक, ताँबा, पारा, लोहा, सोनामाखी इनकी भस्म, रसौत और पातनयन्त्रसें शुद्ध कीहुई आमलासारगन्धक ये प्रत्येक औषधि चारचार तोले लेकर एकत्र कूट पीसलेवे। फिर उस चूर्णको त्रिफले और भाँगरेके रसमें क्रमशः ७ वार भावना देकर सुखालेवे। पश्चात् उसका चूर्णकर उसके साथ पीपलामूल, मुलहठी, इलायचीं, पुनर्नवा, देवदारु, पाढ, भाँगरा, कचूर, वच, नीलकमल और लालचन्दन इनका खूब बारीक चूर्ण कर दसदस रत्तीप्रमाण मिलावे एवं घृत, लौङ्ग और शहद इनको एकएक माशा लेवे। सबको दृढतर और स्वच्छ लोहेके पात्रमें रख लोहेके दण्डसें अच्छे प्रकार खरल करलेवे ॥ ६१-६५॥
अनुपानं प्रदातव्यमुष्णेन वारिणा तथा ।
यावन्तो नेत्ररोगांश्च पानादेव विनाशयेत् ॥ ६६ ॥
सरक्ते रक्तपित्ते च रक्ते चक्षुस्स्रुतेऽपि च ।
नक्तान्ध्ये तिमिरे काचे नीलिकापटलार्बुदे ॥ ६७ ॥
अभिष्यन्देऽधिमन्थे च पिष्टे चैव चिरन्तने ।
नेत्ररोगेषु सर्वेषु वातपित्तकफेषु च ॥
सर्वनेत्रामयं हन्याद् वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ६८ ॥
इस रसको प्रतिदिन उचित मात्रानुसार उष्ण जलके साथ सेवन करे। यह रस पान करतेही जितने नेत्ररोग हैं उन सबको नष्ट करदेता है। इसको रक्तज नेत्ररोग, रक्तपित्त, रक्तज नेत्रस्राव, रात्र्यन्धता, तिमिर, काच, नीलिका, पटल, अर्बुद, नेत्राभिष्यन्द, अधिमन्थ, पुराने पिष्टक एवं वातज, पित्तज और कफज आदि सर्वप्रकारके नेत्ररोगोंमें प्रयोग करना चाहिये। यह रस समस्त नेत्रविकारोंको इस प्रकार नष्ट करदेता है जिस प्रकार वज्राहत वृक्ष तत्काल नष्ट होजाता है ॥ ६६-६८॥
पटोलाद्यघृत ।
पटोलं कुटकां दार्वीं निम्बं वासां फलत्रिकम् ।
दुरालभां पर्प्पटकं त्रायन्तीं च पलोन्मिताम् ॥ ६९ ॥
प्रस्थमामलकानां च क्वाथयेन्नल्वणेऽम्भसि ।
पादशेषे रसे तस्मिन् घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७० ॥
कल्कैर्भू निम्बकुटजमुस्तयष्ट्याह्वचन्दनैः ।
सपिप्पलीकैस्तत्सिद्धमत्यन्तं नेत्रयोर्हितम् ॥ ७१ ॥