भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१२०२ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-
ताँबेके बर्त्तनमें खरल करके सात दिनतक उसीमें रक्खा रहने देवे । सात दिनके बाद फिर उसको बकरीके दूधमें घोटकर बत्ती निर्माण करे । उस बत्तीको नेत्रोंमें लगानेसे दृष्टिशक्ति बढती है । इससे अन्धे और काने पुरुषके भी नेत्र शक्तिशाली होजाते हैं ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
नयनसुखावर्त्ति ।
एकगुणा मागधिका द्विगुणा च हरीतकी सलिलपिष्टा ।
वर्त्तिरियं नयनसुखाऽर्म्मतिमिरपटलकाचाश्रुहरी ॥ ४७ ॥
पीपल एक तोला और हरड दो तोले दोनोंको जलमें पीसकर बत्ती बनावे यह बत्ती नेत्रोंमें प्रयोग करनेसे नेत्रोंको सुख देती है एवं अर्म, तिमिर, पटल, काच और अश्रुपात होना प्रभृति विकारोंको हरती है ॥ ४७ ॥
चन्द्रप्रभावर्त्ति ।
अञ्जनं श्वेतमरिचं पिप्पली मधुयष्टिका ।
विभीतकस्य मध्यं तु शङ्खनाभिर्मनःशिला ॥ ४८ ॥
एतानि समभागानि अजाक्षीरेण पेषयेत् ।
छायाशुष्कां कृतां वर्त्तिं नेत्रेषु च प्रयोजयेत् ॥ ४९ ॥
अर्बुदं पटलं काचं तिमिरं रक्तराजिकाम् ।
अधिमांसाम्मणी चैव पञ्चरात्रौ न पश्यति ॥
वर्त्तिश्चन्द्रप्रभा नाम जातान्ध्यमपि नाशयेत् ॥ १५० ॥
रसौत, सहिजनेके बीज, पीपल, मुलहठी, बहेडेकी गिरी, शंखनाभि और मैनसिल इनको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसलेवे फिर छायामें सुखाकर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीको नेत्रोंमें आँजनेसे अर्बुद, पटल, कांच, तिमिर, रक्तराजिका, अधिमांस, अर्म, रतौंधा और अन्धापन इत्यादि समस्त नेत्रव्याधियाँ नाश होजाती हैं ॥ ४८-१५० ॥
पञ्चशतिकावर्त्ति ।
नीलोत्पलपत्रशतं मुद्गशतं यवशतं च निस्तुषं ग्राह्यम् ।
मालत्याः कुसुमशतं पिप्पलीतण्डुलशतं च ॥ ५१ ॥
पञ्चशतैर्वर्त्तिर्विहिताऽञ्जनं कुर्य्यात्सर्वात्मके नयने ।
तिमिराश्रुकाचपटलानां नास्त्यपरः साधनोपायः॥५२॥